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Rigveda Mandal 5 / Sukta 6 / Mantra 9

87 Sukta
10 Mantra
5/6/9
Devata- अग्निः Rishi- वसुश्रुत आत्रेयः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उ॒भे सु॑श्चन्द्र स॒र्पिषो॒ दर्वी॑ श्रीणीष आ॒सनि॑। उ॒तो न॒ उत्पु॑पूर्या उ॒क्थेषु॑ शवसस्पत॒ इषं॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र ॥९॥

उ॒भे । सु॒ऽच॒न्द्र॒ । स॒र्पिषः॑ । दर्वी॒ इति॑ । श्री॒णी॒षे॒ । आ॒सनि॑ । उ॒तो इति॑ । नः॒ । उत् । पु॒पू॒र्याः॒ । उ॒क्थ्येषु॑ । श॒व॒सः॒ । प॒ते॒ । इष॑म् । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । आ । भ॒र॒ ॥

Mantra without Swara
उभे सुश्चन्द्र सर्पिषो दर्वी श्रीणीष आसनि। उतो न उत्पुपूर्या उक्थेषु शवसस्पत इषं स्तोतृभ्य आ भर ॥

उभे इति। सुऽचन्द्र। सर्पिषः। दर्वी इति। श्रीणीषे। आसनि। उतो इति। नः। उत्। पुपूर्याः। उक्थेषु। शवसः। पते। इषम्। स्तोतृऽभ्यः। आ। भर ॥९॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 23 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सुश्चन्द्र) उत्तम सुवर्ण आदि ऐश्वर्य्य से युक्त (शवसः, पते) सेना के स्वामी ! जो आप (उभे) दोनों (दर्वी) पाक करने के साधानों अर्थात् चम्मचों को इकट्ठे करके (आसनि) मुख में अर्थात् अग्निमुख में (सर्पिषः) घृत आदि का (श्रीणीषे) पाक करते हो (उतो) और उससे (नः) हम लोगों को (उत्, पुपूर्याः) उत्तमता से शोभित करें वा पालें वह आप (उक्थेषु) प्रशंसित धर्म्मसम्बन्धी कर्म्मों में (स्तोतृभ्यः) पढ़ाने और पढ़नेवालों के लिये (इषम्) अन्न का (आ, भर) धारण करें ॥९॥
Essence
जो राजा सेना के भोजन के उत्तम प्रबन्ध को आरोग्य के लिये वैद्यों को रखता है, वही प्रशंसित होकर राज्य बढ़ाता है ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥