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Rigveda Mandal 5 / Sukta 6 / Mantra 7

87 Sukta
10 Mantra
5/6/7
Devata- अग्निः Rishi- वसुश्रुत आत्रेयः Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
तव॒ त्ये अ॑ग्ने अ॒र्चयो॒ महि॑ व्राधन्त वा॒जिनः॑। ये पत्व॑भिः श॒फानां॑ व्र॒जा भु॒रन्त॒ गोना॒मिषं॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र ॥७॥

तव॑ । त्ये । अ॒ग्ने॒ । अ॒र्चयः॑ । महि॑ । व्रा॒ध॒न्त॒ । वा॒जिनः॑ । ये । पत्व॑ऽभिः । श॒फाना॑म् । व्र॒जा । भु॒रन्त॑ । गोना॑म् । इष॑म् । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । आ । भ॒र॒ ॥

Mantra without Swara
तव त्ये अग्ने अर्चयो महि व्राधन्त वाजिनः। ये पत्वभिः शफानां व्रजा भुरन्त गोनामिषं स्तोतृभ्य आ भर ॥

तव। त्ये। अग्ने। अर्चयः। महि। व्राधन्त। वाजिनः। ये। पत्वऽभिः। शफानाम्। व्रजा। भुरन्त। गोनाम्। इषम्। स्तोतृऽभ्यः। आ। भर ॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 23 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वन् ! (ये) जो (गोनाम्) गौओं के (शफानाम्) खुरों के (पत्वभिः) गमनों से (व्रजा) वेगों को (भुरन्त) धारण करते हैं और जो (महि) बड़े (अर्चयः) तेज (वाजिनः) वेगवाले (व्राधन्त) बढ़ते हैं (त्ये) वे (तव) आपके कार्य सिद्ध करनेवाले हैं, उनके विज्ञान से (स्तोतृभ्यः) स्तुति करनेवालों के लिये (इषम्) अन्न को (आ, भर) अच्छे प्रकार धारण कीजिये ॥७॥
Essence
जैसे घोड़े और गाएँ पैरों से दौड़ती हैं, वैसे ही अग्नि के तेज शीघ्र चलते हैं और जो अग्न्यादिकों के संप्रयोग करने को जानते हैं, उन की सब प्रकार वृद्धि होती है ॥७॥
Subject
फिर अग्निविद्या के उपदेश को कहते हैं ॥