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Rigveda Mandal 5 / Sukta 59 / Mantra 7

87 Sukta
8 Mantra
5/59/7
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
वयो॒ न ये श्रेणीः॑ प॒प्तुरोज॒सान्ता॑न्दि॒वो बृ॑ह॒तः सानु॑न॒स्परि॑। अश्वा॑स एषामु॒भये॒ यथा॑ वि॒दुः प्र पर्व॑तस्य नभ॒नूँर॑चुच्यवुः ॥७॥

वयः॑ । न । ये । श्रेणीः॑ । प॒प्तुः । ओज॑सा । अन्ता॑न् । दि॒वः । बृ॒ह॒तः । सानु॑नः । परि॑ । अश्वा॑सः । ए॒षा॒म् । उ॒भये॑ । यथा॑ । वि॒दुः । प्र । पर्व॑तस्य । न॒भ॒नून् । अ॒चु॒च्य॒वुः॒ ॥

Mantra without Swara
वयो न ये श्रेणीः पप्तुरोजसान्तान्दिवो बृहतः सानुनस्परि। अश्वास एषामुभये यथा विदुः प्र पर्वतस्य नभनूँरचुच्यवुः ॥

वयः। न। ये। श्रेणीः। पप्तुः। ओजसा। अन्तान्। दिवः। बृहतः। सानुनः। परि। अश्वासः। एषाम्। उभये। यथा। विदुः। प्र। पर्वतस्य। नभनून्। अचुच्यवुः ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 24 Mantra » 7

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1 Bhashyas
Meaning
(ये) जो (ओजसा) पराक्रम से (वयः) पक्षियों के (न) सदृश (श्रेणीः) पङ्क्तियों को (पप्तुः) प्राप्त होते और (बृहतः) बड़े (सानुनः) शिखर के समान (अन्तान्) समीप में वर्त्तमान (दिवः) व्यवहार करनेवालों को (परि) सब ओर से प्राप्त होते हैं (एषाम्) इनके जो (उभये) दो प्रकार के (अश्वासः) शीघ्र चलनेवाले पदार्थ हैं, उनको (यथा) जिस प्रकार से (विदुः) जानते हैं और (पर्वतस्य) मेघ के (नभनून्) समूहों को (प्र, अचुच्यवुः) अत्यन्त वर्षावें, वे संसार के आधार होते हैं ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पक्षी पङ्क्तिबद्ध हुए शीघ्र जाते हैं, वैसे ही उत्तम प्रकार शिक्षायुक्त नौकर और घोड़े आदि वाहन तीनों मार्गों में शीघ्र जाते हैं ॥७॥
Subject
फिर शिक्षाविषय को कहते हैं ॥