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Rigveda Mandal 5 / Sukta 59 / Mantra 6

87 Sukta
8 Mantra
5/59/6
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
ते अ॑ज्ये॒ष्ठा अक॑निष्ठास उ॒द्भिदोऽम॑ध्यमासो॒ मह॑सा॒ वि वा॑वृधुः। सु॒जा॒तासो॑ ज॒नुषा॒ पृश्नि॑मातरो दि॒वो मर्या॒ आ नो॒ अच्छा॑ जिगातन ॥६॥

ते । अ॒ज्ये॒ष्ठाः । अक॑निष्ठासः । उ॒त्ऽभिदः॑ । अम॑ध्यमासः । मह॑सा । वि । व॒वृ॒धुः॒ । सु॒ऽजा॒तासः॑ । ज॒नुषा॑ । पृश्नि॑ऽमातरः । दि॒वः । मर्याः॑ । आ । नः॒ । अच्छ॑ । जि॒गा॒त॒न॒ ॥

Mantra without Swara
ते अज्येष्ठा अकनिष्ठास उद्भिदोऽमध्यमासो महसा वि वावृधुः। सुजातासो जनुषा पृश्निमातरो दिवो मर्या आ नो अच्छा जिगातन ॥

ते। अज्येष्ठाः। अकनिष्ठासः। उत्ऽभिदः। अमध्यमासः। महसा। वि। ववृधुः। सुऽजातासः। जनुषा। पृश्निऽमातरः। दिवः। मर्याः। आ। नः। अच्छ। जिगातन ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 24 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! जो (अज्येष्ठाः) नहीं विद्यमान ज्येष्ठ जिनके वा (अकनिष्ठासः) नहीं विद्यमान छोटा जिनके वा (उद्भिदः) पृथिवी को फोड़कर उगनेवाले तथा (अमध्यमासः) नहीं विद्यमान मध्यम जिनके वे (जनुषा) जन्म से (सुजातासः) उत्तम व्यवहारों में प्रसिद्ध वा (पृश्निमातरः) अन्तरिक्ष माता जिनका वे और (दिवः) कामना करते हुए (मर्याः) मनुष्य (महसा) बड़े बल आदि से (वि, वावृधुः) विशेष बढ़ते हैं (ते) वे (नः) हम लोगों की (अच्छा) उत्तम प्रकार (आ, जिगातन) सब ओर से प्रशंसा करते हैं ॥६॥
Essence
जो मनुष्यों में यथायोग्य उत्तम शिक्षा हो तो कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम जन विचारशील होकर यथायोग्य जगत् की उन्नति कर सकें ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥