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Rigveda Mandal 5 / Sukta 59 / Mantra 2

87 Sukta
8 Mantra
5/59/2
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अमा॑देषां भि॒यसा॒ भूमि॑रेजति॒ नौर्न पू॒र्णा क्ष॑रति॒ व्यथि॑र्य॒ती। दू॒रे॒दृशो॒ ये चि॒तय॑न्त॒ एम॑भिर॒न्तर्म॒हे वि॒दथे॑ येतिरे॒ नरः॑ ॥२॥

अमा॑त् । ए॒षा॒म् । भि॒यसा॑ । भूमिः॑ । ए॒ज॒ति॒ । नौः । न । पू॒र्णा । क्ष॒र॒ति॒ । व्यथिः॑ । य॒ती । दू॒रे॒ऽदृशः॑ । ये । चि॒तय॑न्ते । एम॑ऽभिः । अ॒न्तः । म॒हे । वि॒दथे॑ । ये॒ति॒रे॒ । नरः॑ ॥

Mantra without Swara
अमादेषां भियसा भूमिरेजति नौर्न पूर्णा क्षरति व्यथिर्यती। दूरेदृशो ये चितयन्त एमभिरन्तर्महे विदथे येतिरे नरः ॥

अमात्। एषाम्। भियसा। भूमिः। एजति। नौः। न। पूर्णा। क्षरति। व्यथिः। यती। दूरेऽदृशः। ये। चितयन्ते। एमऽभिः। अन्तः। महे। विदथे। येतिरे। नरः ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 24 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नरः) नायक मनुष्यो ! जो (भूमिः) पृथिवी (पूर्णा) पूर्ण (नौः) बड़े नौका के (न) सदृश (भियसा) भय से (व्यथिः) पीड़ित होनेवाली (यती) जाती हुई स्त्री के तुल्य (एजति) काँपती है और (एषाम्) इन वायु और अग्नि आदि के (अमात्) गृह से (क्षरति) वर्षाती है उसको (ये) जो (एमभिः) प्राप्त करानेवाले गुणों से इसके (अन्तः) मध्य में (दूरेदृशः) जो दूर देखे जाते वा दूर देखनेवाले (महे) बड़े के लिये (चितयन्ते) उत्तमता से समझाते हैं और (विदथे) संग्राम वा विज्ञानयुक्त व्यवहार में (येतिरे) प्रयत्न करते हैं, वे ही सब को सुखी करने के योग्य होते हैं ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे शूरवीर जनों के समीप से डरनेवाले जन भागते हैं, वैसे ही वायु और सूर्य से भूमि काँपती और चलती है और जैसे पदार्थों से पूर्ण नौका अग्नि आदि के योग से समुद्र के पार को शीघ्र जाती है, वैसे विद्या के पार मनुष्य जावें और जैसे वीर संग्राम में प्रयत्न करते हैं, वैसे ही अन्य मनुष्यों को प्रयत्न करना चाहिये ॥२॥
Subject
अब वायुगुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥