Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 5 / Sukta 59 / Mantra 1

87 Sukta
8 Mantra
5/59/1
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्र वः॒ स्पळ॑क्रन्त्सुवि॒ताय॑ दा॒वनेऽर्चा॑ दि॒वे प्र पृ॑थि॒व्या ऋ॒तं भ॑रे। उ॒क्षन्ते॒ अश्वा॒न्तरु॑षन्त॒ आ रजोऽनु॒ स्वं भा॒नुं श्र॑थयन्ते अर्ण॒वैः ॥१॥

प्र । वः॒ । स्पट् । अ॒क्र॒न् । सु॒वि॒ताय॑ । दा॒वने॑ । अर्च॑ । दि॒वे । प्र । पृ॒थि॒व्यै । ऋ॒तम् । भ॒रे॒ । उ॒क्षन्ते॑ । अश्वा॑न् । तरु॑षन्ते । आ । रजः॑ । अनु॑ । स्वम् । भा॒नुम् । श्र॒थ॒य॒न्ते॒ । अ॒र्ण॒वैः ॥

Mantra without Swara
प्र वः स्पळक्रन्त्सुविताय दावनेऽर्चा दिवे प्र पृथिव्या ऋतं भरे। उक्षन्ते अश्वान्तरुषन्त आ रजोऽनु स्वं भानुं श्रथयन्ते अर्णवैः ॥

प्र। वः। स्पट्। अक्रन्। सुविताय। दावने। अर्च। दिवे। प्र। पृथिव्यै। ऋतम्। भरे। उक्षन्ते। अश्वान्। तरुषन्ते। आ। रजः। अनु। स्वम्। भानुम्। श्रथयन्ते। अर्णवैः ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 24 Mantra » 1

Bhashya

More bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! जो (सुविताय) ऐश्वर्य से युक्त और (दावने) देनेवाले के लिए (दिवे) कामना करते हुए के लिए (पृथिव्यै) अन्तरिक्ष वा भूमि के लिये तथा (वः) आप लोगों के लिये (भरे) धारण करते हैं जिसमें उस व्यवहार में (ऋतम्) सत्य को (प्र, अक्रन्) अच्छे प्रकार करते हैं और (अश्वान्) वेग से युक्त अग्नि आदि को (उक्षन्ते) सेवते हैं तथा (तरुषन्ते) शीघ्र प्लवित होते हैं तथा (रजः) लोक के (अनु) पश्चात् (स्वम्) अपनी (भानुम्) कान्ति को (अर्णवैः) समुद्रों वा नदियों से (प्र, आ, श्रथयन्ते) सब प्रकार शिथिल करते हैं, उनका आप लोग सत्कार करिये और हे राजन् (स्पट्) स्पर्श करनेवाले ! आप इनका निरन्तर (अर्चा) सत्कार कीजिये ॥१॥
Essence
हे राजन् ! जो मनुष्य शिल्पविद्या से विमानादि को रच के अन्तरिक्षादि मार्गों में जा आ कर सब के सुख के लिये ऐश्वर्य्य का आश्रयण करते हैं, वे संसार के विभूषक होते हैं ॥१॥
Subject
अब आठ ऋचावाले उनसठवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वद्गुणों को कहते हैं ॥

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.