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Rigveda Mandal 5 / Sukta 58 / Mantra 7

87 Sukta
8 Mantra
5/58/7
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्रथि॑ष्ट॒ याम॑न्पृथि॒वी चि॑देषां॒ भर्ते॑व॒ गर्भं॒ स्वमिच्छवो॑ धुः। वाता॒न्ह्यश्वा॑न्धु॒र्या॑युयु॒ज्रे व॒र्षँ स्वेदं॑ चक्रिरे रु॒द्रिया॑सः ॥७॥

प्रथि॑ष्ट । याम॑न् । पृ॒थि॒वी । चि॒त् । ए॒षा॒म् । भर्ता॑ऽइव । गर्भ॑म् । स्वम् । इत् । शवः॑ । धुः । वाता॑न् । हि । अश्वा॑न् । धु॒रि । आ॒ऽयु॒यु॒ज्रे । व॒र्षम् । स्वेद॑म् । च॒क्रि॒रे॒ । रु॒द्रिया॑सः ॥

Mantra without Swara
प्रथिष्ट यामन्पृथिवी चिदेषां भर्तेव गर्भं स्वमिच्छवो धुः। वातान्ह्यश्वान्धुर्यायुयुज्रे वर्षँ स्वेदं चक्रिरे रुद्रियासः ॥

प्रथिष्ट। यामन्। पृथिवी। चित्। एषाम्। भर्ताऽइव। गर्भम्। स्वम्। इत्। शवः। धुः। वातान्। हि। अश्वान्। धुरि। आऽयुयुज्रे। वर्षम्। स्वेदम्। चक्रिरे। रुद्रियासः ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 23 Mantra » 7

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (एषाम्) इनके मध्य में (पृथिवी) भूमि (यामन्) प्रहर में (गर्भम्) गर्भ को (भर्त्तेव) स्वामी के सदृश (प्रथिष्ट) प्रकट करती है, वैसे आप लोग (स्वम्) सुख और (शवः) गमन को (इत्) ही (धुरि) वाहन के मध्य में (धुः) धारण करते और (अश्वान्) शीघ्र चलनेवाले (वातान्) पवनों को (आयुयुज्रे) सब ओर से युक्त करते और (चित्) भी (रुद्रियासः) दुष्टों के रुलानेवालों में चतुर हुए (स्वेदम्) पसीने के सदृश (हि) निश्चय (वर्षम्) वृष्टि को (चक्रिरे) करते हैं ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो मनुष्य पृथिवी के सदृश क्षमाशील और विस्तीर्ण विद्यावाले वाहनों के पवन रूप घोड़ों को संयुक्त करके और वृष्टि के कारणों का निर्माण करके कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वे सम्पूर्ण सुख कर सकते हैं ॥७॥
Subject
फिर विद्वद्विषय को कहते हैं ॥

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