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Rigveda Mandal 5 / Sukta 58 / Mantra 6

87 Sukta
8 Mantra
5/58/6
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यत्प्राया॑सिष्ट॒ पृष॑तीभि॒रश्वै॑र्वीळुप॒विभि॑र्मरुतो॒ रथे॑भिः। क्षोद॑न्त॒ आपो॑ रिण॒ते वना॒न्यवो॒स्रियो॑ वृष॒भः क्र॑न्दतु॒ द्यौः ॥६॥

यत् । प्र । अया॑सिष्ट । पृष॑तीभिः । अश्वैः॑ । वी॒ळु॒प॒विऽभिः॑ । म॒रु॒तः॒ । रथे॑भिः । क्षोद॑न्ते । आपः॑ । रि॒ण॒ते । वना॑नि । अव॑ । उ॒स्रियः॑ । वृ॒ष॒भः । क्र॒न्द॒तु॒ । द्यौः ॥

Mantra without Swara
यत्प्रायासिष्ट पृषतीभिरश्वैर्वीळुपविभिर्मरुतो रथेभिः। क्षोदन्त आपो रिणते वनान्यवोस्रियो वृषभः क्रन्दतु द्यौः ॥

यत्। प्र। अयासिष्ट। पृषतीभिः। अश्वैः। वीळुपविऽभिः। मरुतः। रथेभिः। क्षोदन्ते। आपः। रिणते। वनानि। अव। उस्रियः। वृषभः। क्रन्दतु। द्यौः ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 23 Mantra » 6

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Meaning
हे (मरुतः) विद्वान् मनुष्यो ! आप लोग (पृषतीभिः) वेग आदिकों और (अश्वैः) शीघ्र चलनेवाले (रथेभिः) विमान आदि वाहनों से (यत्) जो (वीळुपविभिः) दृढ़ चक्रों से (क्षोदन्ते) वृष्टि करते हैं और जैसे (आपः) जल (वनानि) किरणों को (रिणते) प्राप्त होते हैं, वैसे ही (उस्रियः) किरणों में उत्पन्न (वृषभः) वर्षानेवाला मेघ (द्यौः) कामना करता हुआ किरणों का (अव, क्रन्दतु) आह्वान करे और इष्ट को (प्र, अयासिष्ट) अत्यन्त प्राप्त हों ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जो आप लोग वायु के सदृश शीघ्र गमन और जल के सदृश तृप्ति करने रूप कार्य को करें तो सम्पूर्ण सुखों को प्राप्त हों ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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