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Rigveda Mandal 5 / Sukta 58 / Mantra 1

87 Sukta
8 Mantra
5/58/1
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तमु॑ नू॒नं तवि॑षीमन्तमेषां स्तु॒षे ग॒णं मारु॑तं॒ नव्य॑सीनाम्। य आ॒श्व॑श्वा॒ अम॑व॒द्वह॑न्त उ॒तेशि॑रे अ॒मृत॑स्य स्व॒राजः॑ ॥१॥

तम् । ऊँ॒ इति॑ । नू॒नम् । तवि॑षीऽमन्तम् । ए॒षा॒म् । स्तु॒षे । ग॒णम् । मारु॑तम् । नव्य॑सीनाम् । ये । आ॒शुऽअ॑श्वाः । अम॑ऽवत् । वह॑न्ते । उ॒त । ई॒शि॒रे॒ । अ॒मृत॑स्य । स्व॒ऽराजः॑ ॥

Mantra without Swara
तमु नूनं तविषीमन्तमेषां स्तुषे गणं मारुतं नव्यसीनाम्। य आश्वश्वा अमवद्वहन्त उतेशिरे अमृतस्य स्वराजः ॥

तम्। ऊँ इति। नूनम्। तविषीऽमन्तम्। एषाम्। स्तुषे। गणम्। मारुतम्। नव्यसीनाम्। ये। आशुऽअश्वाः। अमऽवत्। वहन्ते। उत। ईशिरे। अमृतस्य। स्वऽराजः ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 23 Mantra » 1

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Meaning
(अमृतस्य) नाश से रहित कारण (स्वराजः) जो कि आप प्रकाशवान् उसके सम्बन्ध में (आश्वश्वाः) शीघ्र चलनेवाले अग्नि आदि अश्व जिनके वे (ये) जो (अमवत्) गृहों को प्राप्त हों, वैसे (वहन्ते) प्राप्त होते हैं (उत) और (नव्यसीनाम्) अत्यन्त नवीन प्रजाओं के (मारुतम्) पवनसम्बन्धी (गणम्) समूह की (स्तुषे) स्तुति करने के लिये (ईशिरे) ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं (एषाम्) इन वीरों के (उ) तर्क के साथ (तविषीमन्तम्) अच्छी सेना जिसकी (तम्) उसी को (नूनम्) निश्चय प्राप्त होते हैं, वे विजयी होते हैं ॥१॥
Essence
जो कार्य्य और कारणस्वरूप संसार के गुण, कर्म्म और स्वभावों को जानते हैं, वे गृह के सदृश सब को सुखी कर सकते हैं ॥१॥
Subject
अब आठ ऋचावाले अठ्ठावनवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में वायुगुणों को कहते हैं ॥

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