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Rigveda Mandal 5 / Sukta 57 / Mantra 3

87 Sukta
8 Mantra
5/57/3
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
धू॒नु॒थ द्यां पर्व॑तान्दा॒शुषे॒ वसु॒ नि वो॒ वना॑ जिहते॒ याम॑नो भि॒या। को॒पय॑थ पृथि॒वीं पृ॑श्निमातरः शु॒भे यदु॑ग्राः॒ पृष॑ती॒रयु॑ग्ध्वम् ॥३॥

धू॒नु॒थ । द्याम् । पर्व॑ताम् । दा॒शुषे॑ । वसु॑ । नि । वः॒ । वना॑ । जि॒ह॒ते॒ । याम॑नः । भि॒या । को॒पय॑थ । पृ॒थि॒वीम् । पृ॒श्नि॒ऽमा॒त॒रः॒ । शु॒भे । यत् । उ॒ग्राः॒ । पृष॑तीः । अयु॑ग्ध्वम् ॥

Mantra without Swara
धूनुथ द्यां पर्वतान्दाशुषे वसु नि वो वना जिहते यामनो भिया। कोपयथ पृथिवीं पृश्निमातरः शुभे यदुग्राः पृषतीरयुग्ध्वम् ॥

धूनुथ। द्याम्। पर्वतान्। दाशुषे। वसु। नि। वः। वना। जिहते। यामनः। भिया। कोपयथ। पृथिवीम्। पृश्निऽमातरः। शुभे। यत्। उग्राः। पृषतीः। अयुग्ध्वम् ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 21 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (उग्राः) तेजस्वियो ! (पृश्निमातरः) जिनकी माता के सदृश अन्तरिक्ष उन पवनों के सदृश वेग से युक्त (यत्) जो आप लोग (द्याम्) बिजुली और (पर्वतान्) मेघों को (धूनुथ) कँपाइये वह (दाशुषे) दाताजन के लिये (वसु) द्रव्य को कंपित कीजिये जो (वः) आप लोगों को (वना) जङ्गल (जिहते) प्राप्त होते हैं उनको (यामनः) जानेवाले आप लोग (भिया) भय से (नि, कोपयथ) निरन्तर कंपाइये और जैसे पवन (पृथिवीम्) पृथिवी को युक्त होते हैं, वैसे (शुभे) जल के लिये (पृषतीः) सेचन करनेवाली जल की धाराओं को (अयुग्ध्वम्) युक्त कीजिये ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पवन पृथिवी, मेघ और वन आदिकों को कंपाते हैं और जैसे शत्रुजन शत्रुओं को क्रुद्ध करते हैं, वैसे ही विद्वान् जन पदार्थों को मथकर बिजुली आदि को कंपाते हैं और कार्य्यों में युक्त करते हैं ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥