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Rigveda Mandal 5 / Sukta 56 / Mantra 8

87 Sukta
9 Mantra
5/56/8
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
रथं॒ नु मारु॑तं व॒यं श्र॑व॒स्युमा हु॑वामहे। आ यस्मि॑न्त॒स्थौ सु॒रणा॑नि॒ बिभ्र॑ती॒ सचा॑ म॒रुत्सु॑ रोद॒सी ॥८॥

रथ॑म् । नु । मारु॑तम् । व॒यम् । श्र॒व॒स्युम् । आ । हु॒वा॒म॒हे॒ । आ । यस्मि॑न् । त॒स्थौ । सु॒रणा॑नि । बिभ्र॑ती । सचा॑ । म॒रुत्ऽसु॑ । रो॒द॒सी ॥

Mantra without Swara
रथं नु मारुतं वयं श्रवस्युमा हुवामहे। आ यस्मिन्तस्थौ सुरणानि बिभ्रती सचा मरुत्सु रोदसी ॥

रथम्। नु। मारुतम्। वयम्। श्रवस्युम्। आ। हुवामहे। आ। यस्मिन्। तस्थौ। सुऽरणानि। बिभ्रती। सचा। मरुत्ऽसु। रोदसी ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 20 Mantra » 3

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Meaning
(यस्मिन्) जिसमें (सुरणानि) सुन्दर रमण करने योग्य पदार्थ हैं और वीर (आ) सब प्रकार से (तस्थौ) स्थिर हैं तथा जिसमें (मरुत्सु) पवनों में सुन्दर पदार्थों को (बिभ्रती) धारण करते हुए (सचा) सम्बन्ध रखनेवाले (रोदसी) पृथिवी और सूर्य्य वर्त्तमान हैं उस (मारुतम्) मनुष्य और वायुसम्बन्धी (श्रवस्युम्) अपनी श्रवण की इच्छा करनेवाले की और (रथम्) विमान आदि वाहन की (नु) शीघ्र (वयम्) हम लोग (आ, हुवामहे) स्पर्द्धा करें ॥८॥
Essence
जैसे पवन भूमि आदि को धारण करते हैं, वैसे ही विद्वान् जन सब मनुष्यों को धारण करें ॥८॥
Subject
फिर वायुगुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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