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Rigveda Mandal 5 / Sukta 56 / Mantra 4

87 Sukta
9 Mantra
5/56/4
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- निचृद्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
नि ये रि॒णन्त्योज॑सा॒ वृथा॒ गावो॒ न दु॒र्धुरः॑। अश्मा॑नं चित्स्व॒र्यं१॒॑ पर्व॑तं गि॒रिं प्र च्या॑वयन्ति॒ याम॑भिः ॥४॥

नि । ये । रि॒णन्ति॑ । ओज॑सा । वृथा॑ । गावः॑ । न । दुः॒ऽधुरः॑ । अश्मा॑नम् । चि॒त् । स्व॒र्य॑म् । पर्व॑तम् । गि॒रिम् । प्र । च्य॒व॒य॒न्ति॒ । याम॑ऽभिः ॥

Mantra without Swara
नि ये रिणन्त्योजसा वृथा गावो न दुर्धुरः। अश्मानं चित्स्वर्यं१ पर्वतं गिरिं प्र च्यावयन्ति यामभिः ॥

नि। ये। रिणन्ति। ओजसा। वृथा। गावः। न। दुःऽधुरः। अश्मानम्। चित्। स्वर्यम्। पर्वतम्। गिरिम्। प्र। च्यावयन्ति। यामऽभिः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 19 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
(ये) जो मनुष्य (ओजसा) पराक्रम से (नि, रिणन्ति) प्राप्त होते हैं (चित्) और जो (यामभिः) प्रहरों से (स्वर्यम्) शब्दों में श्रेष्ठ (पर्वतम्) पर्वत के सदृश ऊँचे (गिरिम्) शब्द करानेवाले (अश्मानम्) मेघ को (दुर्धुरः) दूरगत हैं धुरा जिनकी उनके (न) समान (प्र, च्यावयन्ति) गिराते हैं और (वृथा) व्यर्थ निज अर्थ के विना (गावः) गौओं के सदृश होते हैं, वे सब से सत्कार करने योग्य होते हैं ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य की किरणें मेघ को नीचे गिराती हैं, वैसे विद्वान् लोग दोषों को दूर करते हैं ॥४॥
Subject
फिर विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥