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Rigveda Mandal 5 / Sukta 55 / Mantra 4

87 Sukta
10 Mantra
5/55/4
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
आ॒भू॒षेण्यं॑ वो मरुतो महित्व॒नं दि॑द्द॒क्षेण्यं॒ सूर्य॑स्येव॒ चक्ष॑णम्। उ॒तो अ॒स्माँ अ॑मृत॒त्वे द॑धातन॒ शुभं॑ या॒तामनु॒ रथा॑ अवृत्सत ॥४॥

आ॒ऽभू॒षेण्य॑म् । वः॒ । म॒रु॒तः॒ । म॒हि॒ऽत्व॒नम् । दि॒दृ॒क्षेण्य॑म् । सूर्य॑स्यऽइव । चक्ष॑णम् । उ॒तो इति॑ । अ॒स्मान् । अ॒मृ॒त॒ऽत्वे । द॒धा॒त॒न॒ । शुभ॑म् । या॒ताम् । अनु॑ । रथाः॑ । अ॒वृ॒त्स॒त॒ ॥

Mantra without Swara
आभूषेण्यं वो मरुतो महित्वनं दिद्दक्षेण्यं सूर्यस्येव चक्षणम्। उतो अस्माँ अमृतत्वे दधातन शुभं यातामनु रथा अवृत्सत ॥

आऽभूषेण्यम्। वः। मरुतः। महिऽत्वनम्। दिदृक्षेण्यम्। सूर्यस्यऽइव। चक्षणम्। उतो इति। अस्मान्। अमृतऽत्वे। दधातन। शुभम्। याताम्। अनु। रथाः। अवृत्सत ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 17 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मरुतः) प्राण के सदृश प्रिय आचरण करनेवालो ! जिन (वः) आप लोगों का (सूर्य्यस्येव) सूर्य्य के सदृश (आभूषेण्यम्) शोभा करने और (दिदृक्षेण्यम्) देखने को योग्य (चक्षणम्) प्रकाश (महित्वनम्) और बड़प्पन है जिससे (उतो) निश्चित (अस्मान्) हम लोगों को (अमृतत्वे) नाशरहित पदार्थों के भाव अर्थात् नित्यपन के वर्त्तमान होने पर (दधातन) धारण कीजिये और जिन (शुभम्) धर्मयुक्त मार्ग को (याताम्) प्राप्त होते हुओं के (रथाः) वाहन (अनु, अवृत्सत) अनुकूल वर्त्तमान हैं, उनका हम लोग निरन्तर सत्कार करें ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो मनुष्य सूर्य्य के सदृश न्याय के प्रकाशक, अन्यायरूपी अन्धकार के रोकनेवाले, धर्ममार्ग के अनुगामी होवें, उनकी सदा ही आप लोग प्रशंसा करो ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥