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Rigveda Mandal 5 / Sukta 55 / Mantra 3

87 Sukta
10 Mantra
5/55/3
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
सा॒कं जा॒ताः सु॒भ्वः॑ सा॒कमु॑क्षि॒ताः श्रि॒ये चि॒दा प्र॑त॒रं वा॑वृधु॒र्नरः॑। वि॒रो॒किणः॒ सूर्य॑स्येव र॒श्मयः॒ शुभं॑ या॒तामनु॒ रथा॑ अवृत्सत ॥३॥

सा॒कम् । जा॒ताः । सु॒ऽभ्वः॑ । सा॒कम् । उ॒क्षि॒ताः । श्रि॒ये । चि॒त् । आ । प्र॒ऽत॒रम् । व॒वृ॒धुः॒ । नरः॑ । वि॒ऽरो॒किणः॑ । सूर्य॑स्यऽइव । र॒श्मयः॑ । शुभ॑म् । या॒ताम् । अनु॑ । रथाः॑ । अ॒वृ॒त्स॒त॒ ॥

Mantra without Swara
साकं जाताः सुभ्वः साकमुक्षिताः श्रिये चिदा प्रतरं वावृधुर्नरः। विरोकिणः सूर्यस्येव रश्मयः शुभं यातामनु रथा अवृत्सत ॥

साकम्। जाताः। सुऽभ्वः साकम्। उक्षिताः। श्रिये। चित्। आ। प्रऽतरम्। ववृधुः। नरः। विऽरोकिणः। सूर्यस्यऽइव। रश्मयः। शुभम्। याताम्। अनु। रथाः। अवृत्सत ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 17 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नरः) सत्य को पहुँचानेवाले मनुष्यो ! (सूर्य्यस्येव) सूर्य के जैसे (साकम्) एक साथ (जाताः) उत्पन्न और (सुभ्वः) शोभित (साकम्) साथ में (उक्षिताः) सींचे हुए (विरोकिणः) अनेक प्रकार की रुचि वर्त्तमान जिनमें वे (रश्मयः) किरण (प्रतरम्) अत्यन्त दुःख से पार करनेवाले व्यवहार को (आ) सब प्रकार (वावृधुः) बढ़ावें वैसे (चित्) भी मित्र होते हुए (श्रिये) शोभा वा धन के लिये प्रवृत्त हूजिये और जैसे (शुभम्) कल्याण को (याताम्) प्राप्त होते हुओं के (रथाः) सुन्दर वाहन आदि (अनु, अवृत्सत) पीछे वर्त्तमान हैं, वैसे सब के उपकार के पीछे वर्तिये ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! आप लोग सूर्य्य की किरणों के सदृश एक साथ ही पुरुषार्थ के लिये उद्यत हूजिये और जैसे कल्याण करनेवालों के रथों के पीछे भृत्यजन वर्त्तमान होते हैं, वैसे ही धर्म के पीछे वर्त्तमान हूजिये ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥