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Rigveda Mandal 5 / Sukta 54 / Mantra 9

87 Sukta
15 Mantra
5/54/9
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
प्र॒वत्व॑ती॒यं पृ॑थि॒वी म॒रुद्भ्यः॑ प्र॒वत्व॑ती॒ द्यौर्भ॑वति प्र॒यद्भ्यः॑। प्र॒वत्व॑तीः प॒थ्या॑ अ॒न्तरि॑क्ष्याः प्र॒वत्व॑न्तः॒ पर्व॑ता जी॒रदा॑नवः ॥९॥

प्र॒वत्व॑ती । इ॒यम् । पृ॒थि॒वी । म॒रुत्ऽभ्यः॑ । प्र॒वत्व॑ती । द्यौः । भ॒व॒ति॒ । प्र॒यत्ऽभ्यः॑ । प्र॒वत्व॑तीः । प॒थ्याः॑ । अ॒न्तरि॑क्ष्याः । प्र॒वत्व॑न्तः । पर्व॑ताः । जी॒रऽदा॑नवः ॥

Mantra without Swara
प्रवत्वतीयं पृथिवी मरुद्भ्यः प्रवत्वती द्यौर्भवति प्रयद्भ्यः। प्रवत्वतीः पथ्या अन्तरिक्ष्याः प्रवत्वन्तः पर्वता जीरदानवः ॥

प्रवत्वती। इयम्। पृथिवी। मरुत्ऽभ्यः। प्रवत्वती। द्यौः। भवति। प्रयत्ऽभ्यः। प्रवत्वतीः। पथ्याः। अन्तरिक्ष्याः। प्रवत्वन्तः। पर्वताः। जीरऽदानवः ॥९॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 15 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (इयम्) यह (प्रवत्वती) नीचे के स्थान से युक्त (पृथिवी) भूमि और (प्रवत्वती) फैलनेवाला (द्यौः) प्रकाश और (प्रयद्भ्यः) प्रयत्न करते हुए (मरुद्भ्यः) मनुष्य आदिकों के लिये हितकारक (भवति) होता है जिसमें (प्रवत्वन्तः) गमनशील (जीरदानवः) जीवन को देनेवाले (पर्वताः) मेघ (अन्तरिक्ष्याः) अन्तरिक्ष में उत्पन्न (प्रवत्वतीः) नीचे चलनेवाले (पथ्याः) मार्ग के लिये हितकारक वृष्टियों को करते हैं, वे यथावत् जानने योग्य हैं ॥९॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि पृथिवी के समीप से जितना हो सकता है, उतना उपकार ग्रहण करें ॥९॥
Subject
मनुष्यों को कैसे उपकार लेना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥