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Rigveda Mandal 5 / Sukta 54 / Mantra 12

87 Sukta
15 Mantra
5/54/12
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
तं नाक॑म॒र्यो अगृ॑भीतशोचिषं॒ रुश॒त्पिप्प॑लं मरुतो॒ वि धू॑नुथ। सम॑च्यन्त वृ॒जनाति॑त्विषन्त॒ यत्स्वर॑न्ति॒ घोषं॒ वित॑तमृता॒यवः॑ ॥१२॥

तम् । नाक॑म् । अ॒र्यः । अगृ॑भीतऽशोचिषम् । रुश॑त् । पिप्प॑लम् । म॒रु॒तः॒ । वि । धू॒नु॒थ॒ । सम् । अ॒च्य॒न्त॒ । वृ॒जना॑ । अति॑त्विषन्त । यत् । स्वर॑न्ति । घोष॑म् । विऽत॑तम् । ऋ॒त॒ऽयवः॑ ॥

Mantra without Swara
तं नाकमर्यो अगृभीतशोचिषं रुशत्पिप्पलं मरुतो वि धूनुथ। समच्यन्त वृजनातित्विषन्त यत्स्वरन्ति घोषं विततमृतायवः ॥

तम्। नाकम्। अर्यः। अगृभीतऽशोचिषम्। रुशत्। पिप्पलम्। मरुतः। वि। धूनुथ। सम्। अच्यन्त। वृजना। अतित्विषन्त। यत्। स्वरन्ति। घोषम्। विऽततम्। ऋतऽयवः ॥१२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 16 Mantra » 2

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Meaning
हे (मरुतः) वायु के सदृश वेगयुक्त वर्त्तमान जनो ! आप लोग (अर्यः) स्वामी ईश्वर के सदृश (ऋतायवः) अपने सत्य की इच्छा करते हुए (यत्) जिस (विततम्) विस्तृत (घोषम्) वाणी का (स्वरन्ति) उच्चारण करते हैं (तम्) उस (अगृभीतशोचिषम्) अगृभीतशोचिषम् अर्थात् नहीं ग्रहण की स्वच्छता जिसमें ऐसे (रुशत्) अच्छे स्वरूपवाले (पिप्पलम्) फलभोगरूप (नाकम्) दुःखरहित आनन्द को (सम्, अच्यन्त) उत्तम प्रकार प्राप्त हूजिये दुःख को (वि) विशेष करके (धूनुथ) कम्पाइये और (वृजना) चलते हैं जिनसे उनको (अतित्विषन्त) प्रकाशित कीजिये तथा प्रकाशित हूजिये ॥१२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य ईश्वर के सदृश न्यायकारी सम्पूर्ण जगत् के उपकार करनेवाले और उपदेशक हैं, वे संसार के भूषक हैं ॥१२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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