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Rigveda Mandal 5 / Sukta 53 / Mantra 7

87 Sukta
16 Mantra
5/53/7
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
त॒तृ॒दा॒नाः सिन्ध॑वः॒ क्षोद॑सा॒ रजः॒ प्र स॑स्रुर्धे॒नवो॑ यथा। स्य॒न्ना अश्वा॑इ॒वाध्व॑नो वि॒मोच॑ने॒ वि यद्वर्त॑न्त ए॒न्यः॑ ॥७॥

त॒तृ॒दा॒नाः । सिन्ध॑वः । क्षोद॑सा । रजः॑ । प्र । स॒स्रुः॒ । धे॒नवः॑ । य॒था॒ । स्य॒न्नाः । अश्वाः॑ऽइव । अध्व॑नः । वि॒ऽमोच॑ने । वि । यत् । वर्त॑न्ते । ए॒न्यः॑ ॥

Mantra without Swara
ततृदानाः सिन्धवः क्षोदसा रजः प्र सस्रुर्धेनवो यथा। स्यन्ना अश्वाइवाध्वनो विमोचने वि यद्वर्तन्त एन्यः ॥

ततृदानाः। सिन्धवः। क्षोदसा। रजः। प्र। सस्रुः। धेनवः। यथा। स्यन्नाः। अश्वाःऽइव। अध्वनः। विऽमोचने। वि। यत्। वर्तन्ते। एन्यः ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 12 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यथा) जिस प्रकार से (धेनवः) दुग्ध देनेवाली गौएँ वैसे (क्षोदसा) जल से (ततृदानाः) भूमि को तोड़नेवाली (सिन्धवः) नदियाँ (रजः) लोक को (प्र, सस्रुः) प्रस्रवित करती हैं । और (अश्वाइव) जैसे घोड़े दौड़ते हैं, वैसे (यत्) जो (स्यन्नाः) शीघ्र जानेवाली (एन्यः) नदियाँ (विमोचने) विमोचन में (अध्वनः) मार्गों को (वि, वर्त्तन्ते) बितातीं हैं, उनसे सम्पूर्ण उपकार ग्रहण करने चाहियें ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जैसे दुग्ध देनेवाली गौवें दुग्ध की वृष्टि करती हैं, वैसे ही नदी, तड़ाग, समुद्र आदि और अन्य जलाशय पृथिवी में वृष्टि करते हैं ॥७॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या जानना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥