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Rigveda Mandal 5 / Sukta 53 / Mantra 3

87 Sukta
16 Mantra
5/53/3
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- भुरिग्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ते म॑ आहु॒र्य आ॑य॒युरुप॒ द्युभि॒र्विभि॒र्मदे॑। नरो॒ मर्या॑ अरे॒पस॑ इ॒मान्पश्य॒न्निति॑ ष्टुहि ॥३॥

ते । मे॒ । आहुः॑ । ये । आ॒ऽय॒युः । उप॑ । द्युऽभिः॑ । विऽभिः॑ । मदे॑ । नरः॑ । मर्याः॑ । अ॒रे॒पसः॑ । इ॒मान् । पश्य॑न् । इति॑ । स्तु॒हि॒ ॥

Mantra without Swara
ते म आहुर्य आययुरुप द्युभिर्विभिर्मदे। नरो मर्या अरेपस इमान्पश्यन्निति ष्टुहि ॥

ते। मे। आहुः। ये। आऽययुः। उप। द्युऽभिः। विऽभिः। मदे। नरः। मर्याः। अरेपसः। इमान्। पश्यन्। इति। स्तुहि ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 11 Mantra » 3

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Meaning
(ये) जो (अरेपसः) दोषों के लेप से रहित (मर्य्याः) मरण धर्म्मवाले (नरः) नायक मनुष्य (द्युभिः) कामना करते हुए (विभिः) पक्षियों के सदृश (मदे) आनन्द के लिये (मे) मेरे सत्य को (आहुः) कहें और (आययुः) जानें वा प्राप्त होवें (ते) वे (इमान्) इन मनोरथों को (पश्यन्) देखते हुए के समान कहें (इति) इस प्रकार आप मेरी (उप, स्तुहि) समीप में स्तुति करिये ॥३॥
Essence
जो विद्वान् जन दिन-रात्रि परिश्रम से विद्या को प्राप्त होकर अन्यों को उपदेश देवें, उनको यथार्थवक्ता जानना चाहिये ॥३॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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