Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 5 / Sukta 53 / Mantra 16

87 Sukta
16 Mantra
5/53/16
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
स्तु॒हि भो॒जान्त्स्तु॑व॒तो अ॑स्य॒ याम॑नि॒ रण॒न्गावो॒ न यव॑से। य॒तः पूर्वाँ॑इव॒ सखीँ॒रनु॑ ह्वय गि॒रा गृ॑णीहि का॒मिनः॑ ॥१६॥

स्तु॒हि । भो॒जान् । स्तु॒व॒तः । अ॒स्य॒ । याम॑नि । रण॑म् । गावः॑ । न । यव॑से । य॒तः । पूर्वा॑न्ऽइव । सखी॑न् । अनु॑ । ह्व॒य॒ । गि॒रा । गृ॒णी॒हि॒ । का॒मिनः॑ ॥

Mantra without Swara
स्तुहि भोजान्त्स्तुवतो अस्य यामनि रणन्गावो न यवसे। यतः पूर्वाँइव सखीँरनु ह्वय गिरा गृणीहि कामिनः ॥

स्तुहि। भोजान्। स्तुवतः। अस्य। यामनि। रणन्। गावः। न। यवसे। यतः। पूर्वान्ऽइव। सखीन्। अनु। ह्वय। गिरा। गृणीहि। कामिनः ॥१६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 13 Mantra » 6

Bhashya

More bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! (रणन्) उपदेश देते हुए आप (स्तुवतः) प्रशंसा करनेवाले (भोजान्) पालकों की (स्तुहि) स्तुति कीजिये और (अस्य) इस रक्षण के (यामनि) मार्ग में (यतः) जिससे (पूर्वानिव) जैसे पूर्व वैसे वर्त्तमान (सखीन्) मित्रों का (गिरा) वाणी से (अनु, ह्वय) निमन्त्रण करो और मित्रों को (यवसे) बुस आदि में (गावः) गौओं के (न) सदृश निमन्त्रण करो और (कामिनः) श्रेष्ठ मनोरथ जिनका उनकी (गृणीहि) स्तुति करो ॥१६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे विद्वन् ! जो प्रशंसा करने योग्य और सब के मित्र और सत्य की कामना करनेवाले होवें, उनका सदा ही सत्कार करो ॥१६॥ इस सूक्त में प्रश्न उत्तर और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह तिरपनवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.