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Rigveda Mandal 5 / Sukta 53 / Mantra 14

87 Sukta
16 Mantra
5/53/14
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अती॑याम नि॒दस्ति॒रः स्व॒स्तिभि॑र्हि॒त्वाव॒द्यमरा॑तीः। वृ॒ष्ट्वी शं योराप॑ उ॒स्रि भे॑ष॒जं स्याम॑ मरुतः स॒ह ॥१४॥

अति॑ । इ॒या॒म॒ । नि॒दः । ति॒रः । स्व॒स्तिऽभिः॑ । हि॒त्वा । अ॒व॒द्यम् । अरा॑तीः । वृ॒ष्ट्वी । सम् । योः । आपः॑ । उ॒स्रि । भे॒ष॒जम् । स्याम॑ । म॒रु॒तः॒ । स॒ह ॥

Mantra without Swara
अतीयाम निदस्तिरः स्वस्तिभिर्हित्वावद्यमरातीः। वृष्ट्वी शं योराप उस्रि भेषजं स्याम मरुतः सह ॥

अति। इयाम। निदः। तिरः। स्वस्तिऽभिः। हित्वा। अवद्यम्। अरातीः। वृष्ट्वी। शम्। योः। आपः। उस्रि। भेषजम्। स्याम। मरुतः। सह ॥१४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 13 Mantra » 4

Bhashya

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Meaning
हे (मरुतः) मनुष्यो ! जैसे हम लोग (निदः) निन्दा करनेवाले मिथ्यावादियों का (अति, इयाम) उल्लङ्घन करें अर्थात् त्याग करें और (स्वस्तिभिः) सुख आदिकों से (तिरः) तिरश्चीन कर्म्म और (अवद्यम्) निन्दित कर्म्म (अरातीः) और शत्रुओं का (हित्वा) त्याग और (शम्) सुख (वृष्ट्वी) वर्षा करके (आपः) जलों को और (योः) मिश्रित (उस्रि) गो आदि से युक्त (भेषजम्) ओषधि को सुख आदिकों के (सह) साथ प्राप्त (स्याम) होवें, वैसे आप लोगों को होना चाहिये ॥१४॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि निन्दक, निन्दा और पापी तथा पाप को छोड़ शत्रुओं को जीतकर, ओषधि आदि के सेवन से शरीर रोगरहित कर, विद्या और योगाभ्यास से आत्मा की उन्नति करके निरन्तर सुख प्राप्त करें ॥१४॥
Subject
फिर मनुष्यों को कैसा वर्त्ताव करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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