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Rigveda Mandal 5 / Sukta 52 / Mantra 9

87 Sukta
17 Mantra
5/52/9
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
उ॒त स्म॒ ते परु॑ष्ण्या॒मूर्णा॑ वसत शु॒न्ध्यवः॑। उ॒त प॒व्या रथा॑ना॒मद्रिं॑ भिन्द॒न्त्योज॑सा ॥९॥

उ॒त । स्म॒ । ते । परु॑ष्ण्याम् । ऊर्णाः॑ । व॒स॒त॒ । शु॒न्ध्यवः॑ । उ॒त । प॒व्या । रथा॑नाम् । अद्रि॑म् । भि॒न्द॒न्ति॒ । ओज॑सा ॥

Mantra without Swara
उत स्म ते परुष्ण्यामूर्णा वसत शुन्ध्यवः। उत पव्या रथानामद्रिं भिन्दन्त्योजसा ॥

उत। स्म। ते। परुष्ण्याम्। ऊर्णाः। वसत। शुन्ध्यवः। उत। पव्या। रथानाम्। अद्रिम्। भिन्दन्ति। ओजसा ॥९॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 9 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (परुष्ण्याम्) पालन करनेवाली में (शुन्ध्यवः) शोधन करनेवाली (रथानाम्) वाहनों के (पव्या) रथों के चक्रों पहियों की लीकों के सदृश (ओजसा) बल से (अद्रिम्) मेघ को (भिन्दन्ति) तोड़ती हैं (उत) और वर्षाती हैं, वे (ते) तुम्हारे लिये हों (उत) और (स्म) निश्चित (ऊर्णाः) रक्षित हुए यहाँ सत्कार किये गये आप लोग (वसत) वसिये ॥९॥
Essence
जैसे मेघ वर्षते हुए पृथिवी को विदीर्ण करते हैं, वैसे ही श्रेष्ठ पुरुषों का सङ्ग अशुद्धि का नाश करता है ॥९॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥