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Rigveda Mandal 5 / Sukta 52 / Mantra 7

87 Sukta
17 Mantra
5/52/7
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ये वा॑वृ॒धन्त॒ पार्थि॑वा॒ य उ॒राव॒न्तरि॑क्ष॒ आ। वृ॒जने॑ वा न॒दीनां॑ स॒धस्थे॑ वा म॒हो दि॒वः ॥७॥

ये । व॒वृ॒धन्त॑ । पार्थि॑वाः । ये । उ॒रौ । अ॒न्तरि॑क्षे । आ । वृ॒जने॑ । वा॒ । न॒दीना॑म् । स॒धऽस्थे॑ । वा॒ । म॒हः । दि॒वः ॥

Mantra without Swara
ये वावृधन्त पार्थिवा य उरावन्तरिक्ष आ। वृजने वा नदीनां सधस्थे वा महो दिवः ॥

ये। ववृधन्त। पार्थिवाः। ये। उरौ। अन्तरिक्षे। आ। वृजने। वा। नदीनाम्। सधऽस्थे। वा। महः। दिवः ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 9 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! (ये) जो (उरौ) बहुत रूपवाले (अन्तरिक्षे) आकाश में (पार्थिवः) पृथिवी में जाने गये पदार्थ (वावृधन्त) अत्यन्त वृद्धि को प्राप्त होते हैं (ये, वा) अथवा जो (नदीनाम्) नदियों के (सधस्थे) समान स्थान में (वृजने, वा) वा वर्जते हैं जिसमें उसमें (आ) सब प्रकार अत्यन्त वृद्धि को प्राप्त होते हैं और (महः) महान् (दिवः) कामना करनेवाले वृद्धि को प्राप्त होते हैं, उनको आप लोग विशेष करके जानिये ॥७॥
Essence
जो पृथिवी आदिकों की विद्या को जानते हैं, वे सब प्रकार वृद्धि को प्राप्त होते हैं ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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