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Rigveda Mandal 5 / Sukta 52 / Mantra 4

87 Sukta
17 Mantra
5/52/4
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
म॒रुत्सु॑ वो दधीमहि॒ स्तोमं॑ य॒ज्ञं च॑ धृष्णु॒या। विश्वे॒ ये मानु॑षा यु॒गा पान्ति॒ मर्त्यं॑ रि॒षः ॥४॥

म॒रुत्ऽसु॑ । वः॒ । द॒धी॒म॒हि॒ । स्तोम॑म् । य॒ज्ञम् । च॒ । धृ॒ष्णु॒ऽया । विश्वे॑ । ये । मानु॑षा । यु॒गा । पान्ति॑ । मर्त्य॑म् । रि॒षः ॥

Mantra without Swara
मरुत्सु वो दधीमहि स्तोमं यज्ञं च धृष्णुया। विश्वे ये मानुषा युगा पान्ति मर्त्यं रिषः ॥

मरुत्ऽसु। वः। दधीमहि। स्तोमम्। यज्ञम्। च। धृष्णुऽया। विश्वे। ये। मानुषा। युगा। पान्ति। मर्त्यम्। रिषः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 8 Mantra » 4

Bhashya

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Meaning
हे मनुष्यो ! (ये) जो (विश्वे) सब आप लोग (धृष्णुया) दृढ़ (मानुषा) मनुष्यों के सम्बन्धी (युगा) वर्षों को (स्तोमम्) प्रशंसा करने योग्य (यज्ञम्) पुरुषार्थ को (मर्त्यम्, च) और मनुष्य को (रिषः) हिंसक के (पान्ति) रखते अर्थात् बचाते हैं, उन (वः) आप लोगों को हम लोग (मरुत्सु) मनुष्यों में (दधीमहि) धारण करें ॥४॥
Essence
जो देव और मनुष्यसम्बन्धी युगों और वर्षों को जानते हैं, वे गणितविद्या के जाननेवाले होते हैं ॥४॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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