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Rigveda Mandal 5 / Sukta 52 / Mantra 3

87 Sukta
17 Mantra
5/52/3
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ते स्य॒न्द्रासो॒ नोक्षणोऽति॑ ष्कन्दन्ति॒ शर्व॑रीः। म॒रुता॒मधा॒ महो॑ दि॒वि क्ष॒मा च॑ मन्महे ॥३॥

ते । स्प॒न्द्रासः॑ । न । उ॒क्षणः॑ । अति॑ । स्क॒न्द॒न्ति॒ । शर्व॑रीः । म॒रुता॑म् । अध॑ । महः॑ । दि॒वि । क्ष॒मा । च॒ । म॒न्म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
ते स्यन्द्रासो नोक्षणोऽति ष्कन्दन्ति शर्वरीः। मरुतामधा महो दिवि क्षमा च मन्महे ॥

ते। स्यन्द्रासः। न। उक्षणः। अति। स्कन्दन्ति। शर्वरीः। मरुताम्। अध। महः। दिवि। क्षमा। च। मन्महे ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 8 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! जो (महः) बड़े (दिवि) प्रकाश और (मरुताम्) मनुष्यों के समीप में (क्षमा) (अधा, च) और इसके अनन्तर (स्यन्द्रासः) कुछ चेष्टा करते हुओं के (न) सदृश (उक्षणः) सेवन करने वा (शर्वरीः) रात्रियों को (अति, स्कन्दन्ति) अत्यन्त प्राप्त होते हैं, उनको हम लोग (मन्महे) विशेष प्रकार से जानते हैं (ते) वे सब मनुष्यों को जानने योग्य हैं ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य दिन-रात्रि पुरुषार्थ करते हैं, वे दुःख का उल्लङ्घन करते हैं ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥