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Rigveda Mandal 5 / Sukta 52 / Mantra 16

87 Sukta
17 Mantra
5/52/16
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- बृहती Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्र ये मे॑ बन्ध्वे॒षे गां वोच॑न्त सू॒रयः॒ पृश्निं॑ वोचन्त मा॒तर॑म्। अधा॑ पि॒तर॑मि॒ष्मिणं॑ रु॒द्रं वो॑चन्त॒ शिक्व॑सः ॥१६॥

प्र । ये । मे॒ । ब॒न्धु॒ऽए॒षे । गाम् । वोच॑न्त । सू॒रयः॑ । पृश्नि॑म् । वो॒च॒न्त॒ । मा॒तर॑म् । अध॑ । पि॒तर॑म् । इ॒ष्मिण॑म् । रु॒द्रम् । वो॒च॒न्त॒ । शिक्व॑सः ॥

Mantra without Swara
प्र ये मे बन्ध्वेषे गां वोचन्त सूरयः पृश्निं वोचन्त मातरम्। अधा पितरमिष्मिणं रुद्रं वोचन्त शिक्वसः ॥

प्र। ये। मे। बन्धुऽएषे। गाम्। वोचन्त। सूरयः। पृश्निम्। वोचन्त। मातरम्। अध। पितरम्। इष्मिणम्। रुद्रम्। वोचन्त। शिक्वसः ॥१६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 10 Mantra » 6

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Meaning
(ये) जो (सूरयः) विद्वान् जन (मे) मेरी (बन्ध्वेषे) बन्धुओं की इच्छा के लिये (गाम्) वाणी को (प्र, वोचन्त) उत्तम प्रकार उच्चारण करते हैं और (पृश्निम्) अन्तरिक्ष और (मातरम्) माता का (वोचन्त) उपदेश करते हैं (अधा) इसके अनन्तर (शिक्वसः) सामर्थ्यवाले (इष्मिणम्) बहुत प्रकार का बल जिसका उस (पितरम्) पालन करनेवाले पिता और (रुद्रम्) दुष्टों के भय देनेवाले का (वोचन्त) उपदेश करते हैं, वे मुझ से सत्कार करने योग्य हैं ॥१६॥
Essence
मनुष्यों को इस प्रकार जानना चाहिये कि जो हम लोगों के लिये विद्या और उत्तम शिक्षा को देवें, वे हम लोगों से सदा आदर करने योग्य होवें ॥१६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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