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Rigveda Mandal 5 / Sukta 52 / Mantra 15

87 Sukta
17 Mantra
5/52/15
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
नू म॑न्वा॒न ए॑षां दे॒वाँ अच्छा॒ न व॒क्षणा॑। दा॒ना स॑चेत सू॒रिभि॒र्याम॑श्रुतेभिर॒ञ्जिभिः॑ ॥१५॥

नु । म॒न्वा॒नः । ए॒षा॒म् । दे॒वान् । अच्छ॑ । न । व॒क्षणा॑ । दा॒ना । स॒चे॒त॒ । सू॒रिऽभिः॑ । याम॑ऽश्रुतेभिः । अ॒ञ्जिऽभिः॑ ॥

Mantra without Swara
नू मन्वान एषां देवाँ अच्छा न वक्षणा। दाना सचेत सूरिभिर्यामश्रुतेभिरञ्जिभिः ॥

नु। मन्वानः। एषाम्। देवान्। अच्छ। न। वक्षणा। दाना। सचेत। सूरिऽभिः। यामऽश्रुतेभिः। अञ्जिऽभिः ॥१५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 10 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (मन्वानः) मननशील पुरुष (यामश्रुतेभिः) याम प्रहर सुने गये जिनसे उन (अञ्जिभिः) विद्या और श्रेष्ठ गुणों के प्रकट करनेवाले (सूरिभिः) विद्वानों के साथ (एषाम्) इन मनुष्यों के मध्य में (देवान्) श्रेष्ठ विद्वानों वा श्रेष्ठ पदार्थों को (अच्छा) उत्तम प्रकार प्राप्त होता और (वक्षणा) प्रवाह से (दाना) दानों को करता है वह (नू) निश्चय दारिद्र्य और अज्ञान को (न) नहीं प्राप्त होता है, उसको आप लोग (सचेत) सम्बन्धित करिये ॥१५॥
Essence
जो मनुष्य विद्वानों के सङ्ग को प्रिय मानने और विद्या के दान में रुचि करनेवाले होवें, वे ही शीघ्र विद्या को प्राप्त होवें ॥१५॥
Subject
फिर मनुष्य विद्वानों के सङ्ग से विद्याओं को प्राप्त हों, इस विषय को कहते हैं ॥

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