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Rigveda Mandal 5 / Sukta 52 / Mantra 14

87 Sukta
17 Mantra
5/52/14
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अच्छ॑ ऋषे॒ मारु॑तं ग॒णं दा॒ना मि॒त्रं न यो॒षणा॑। दि॒वो वा॑ धृष्णव॒ ओज॑सा स्तु॒ता धी॒भिरि॑षण्यत ॥१४॥

अच्छ॑ । ऋ॒षे॒ । मारु॑तम् । ग॒णम् । दा॒ना । मि॒त्रम् । न । यो॒षणा॑ । दि॒वः । वा॒ । धृ॒ष्ण॒वः॒ । ओज॑सा । स्तु॒ताः । धी॒भिः । इ॒ष॒ण्य॒त॒ ॥

Mantra without Swara
अच्छ ऋषे मारुतं गणं दाना मित्रं न योषणा। दिवो वा धृष्णव ओजसा स्तुता धीभिरिषण्यत ॥

अच्छ। ऋषे। मारुतम्। गणम्। दाना। मित्रम्। न। योषणा। दिवः। वा। धृष्णवः। ओजसा। स्तुताः। धीभिः। इषण्यत ॥१४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 10 Mantra » 4

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Meaning
हे (ऋषे) विद्वन् ! आप (योषणा) स्त्री और (मित्रम्) मित्र के (न) सदृश (मारुतम्) मनुष्यसम्बन्धी (गणम्) समूह को (अच्छ) उत्तम प्रकार प्राप्त हूजिये (वा) वा जैसे (दिवः) कामना करते हुए (धृष्णवः) धृष्ट, प्रगल्भ, दृढ़ निश्चयवाले (स्तुताः) प्रशंसितजन (धीभिः) बुद्धियों और (ओजसा) बल आदि से (दाना) दानों को देकर मनुष्यसम्बन्धी समूह को (इषण्यत) प्राप्त होते हैं, वैसे सब प्राप्त हों ॥१४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। सम्पूर्ण अध्यापक और पढ़नेवाले मित्र के सदृश परस्पर वर्त्ताव करके वायु आदि पदार्थों की विद्या का अच्छे प्रकार ग्रहण करें ॥१४॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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