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Rigveda Mandal 5 / Sukta 52 / Mantra 13

87 Sukta
17 Mantra
5/52/13
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- विराडुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
य ऋ॒ष्वा ऋ॒ष्टिवि॑द्युतः क॒वयः॒ सन्ति॑ वे॒धसः॑। तमृ॑षे॒ मारु॑तं ग॒णं न॑म॒स्या र॒मया॑ गि॒रा ॥१३॥

यः । ऋ॒ष्वाः । ऋ॒ष्टिऽवि॑द्युतः । क॒वयः॑ । सन्ति॑ । वे॒धसः॑ । तम् । ऋ॒षे॒ । मारु॑तम् । ग॒णम् । न॒म॒स्य । र॒मय॑ । गि॒रा ॥

Mantra without Swara
य ऋष्वा ऋष्टिविद्युतः कवयः सन्ति वेधसः। तमृषे मारुतं गणं नमस्या रमया गिरा ॥

ये। ऋष्वाः। ऋष्टिऽविद्युतः। कवयः। सन्ति। वेधसः। तम्। ऋषे। मारुतम्। गणम्। नमस्य। रमय। गिरा ॥१३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 10 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (ऋषे) वेदार्थ के जाननेवाले ! (ये) जो (ऋष्टिविद्युतः) ऋष्टिविद्युत् अर्थात् बिजुली में विज्ञान जिनका वे (कवयः) सम्पूर्ण शास्त्रों में निपुण (ऋष्वाः) बड़े महाशय (वेधसः) बुद्धिमान् जन (सन्ति) हैं उनका (गिरा) उत्तम प्रकार शिक्षित सत्य कोमल वाणी से (नमस्या) सत्कार करिये और इससे (तम्) उस (मारुतम्) विद्वान् मनुष्यों के (गणम्) समूह को (रमया) क्रीड़ा से आनन्दित करिये ॥१३॥
Essence
जो महाशय यथार्थवक्त जनों की सेवा और सत्कार कर उत्तम शिक्षा को प्राप्त होकर सत्य और असत्य के विवेक के लिये उपदेश करके सब मनुष्यों को आनन्दित करते हैं, वे सब लोगों से सत्कार पाने योग्य होते हैं ॥१३॥
Subject
मनुष्यों को किसका सङ्ग करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥