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Rigveda Mandal 5 / Sukta 52 / Mantra 11

87 Sukta
17 Mantra
5/52/11
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- विराडुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अधा॒ नरो॒ न्यो॑ह॒तेऽधा॑ नि॒युत॑ ओहते। अधा॒ पारा॑वता॒ इति॑ चि॒त्रा रू॒पाणि॒ दर्श्या॑ ॥११॥

अध॑ । नरः॑ । नि । ओ॒ह॒ते॒ । अध॑ । नि॒ऽयुतः॑ । ओ॒ह॒ते॒ । अध॑ । पारा॑वताः । इति॑ । चि॒त्रा । रू॒पाणि॑ । दर्श्या॑ ॥

Mantra without Swara
अधा नरो न्योहतेऽधा नियुत ओहते। अधा पारावता इति चित्रा रूपाणि दर्श्या ॥

अधः। नरः। नि। ओहते। अध। निऽयुतः। ओहते। अध। पारावताः। इति। चित्रा। रूपाणि। दर्श्या ॥११॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 10 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! (अधा) इसके अनन्तर जो (नरः) विद्याओं में अग्रणी जन विद्याओं के कार्यों को (नि) निश्चय करके (ओहते) प्राप्त होते हैं, और (अधा) इसके अनन्तर (नियुतः) निश्चित वायु आदि गमनवाला (ओहते) प्राप्त होता वा प्राप्त कराता है (अधा) इसके अनन्तर (पारावता) दूर देश में होनेवाले (दर्श्या) देखने के योग्य (चित्रा) अद्भुत (रूपाणि) रूपों के (इति) इस प्रकार से प्रत्यक्ष करता है, वह कृतकृत्य होता है ॥११॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि पहिले ब्रह्मचर्य्य से विद्याओं को प़ढ़कर उसके अनन्तर कार्य्यों के रचने में प्रवीणता को प्रत्यक्ष करके फिर अनुमान से दूर में स्थित अदृश्य पदार्थों के विज्ञान को करके आश्चर्य्ययुक्त कार्य्य करें ॥११॥
Subject
मनुष्य क्रम से विद्यादि व्यवहार को प्राप्त होवें, इस विषय को कहते हैं ॥