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Rigveda Mandal 5 / Sukta 52 / Mantra 10

87 Sukta
17 Mantra
5/52/10
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आप॑थयो॒ विप॑थ॒योऽन्त॑स्पथा॒ अनु॑पथाः। ए॒तेभि॒र्मह्यं॒ नाम॑भिर्य॒ज्ञं वि॑ष्टा॒र ओ॑हते ॥१०॥

आप॑थयः । विऽप॑थयः । अन्तः॑ऽपथाः । अनु॑ऽपथाः । ए॒तेभिः । मह्य॑म् । नाम॑ऽभिः । य॒ज्ञम् । वि॒ऽस्ता॒रः । ओ॒ह॒ते॒ ॥

Mantra without Swara
आपथयो विपथयोऽन्तस्पथा अनुपथाः। एतेभिर्मह्यं नामभिर्यज्ञं विष्टार ओहते ॥

आऽपथयः। विऽपथयः। अन्तःऽपथा। अनुऽपथाः। एतेभिः। मह्यम्। नामऽभिः। यज्ञम्। विऽस्तारः। ओहते ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 9 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (आपथयः) सब ओर अभिमुख मार्ग जिनका वे और (विपथयः) अनेक प्रकार के वा विरुद्ध मार्ग जिनके वे और (अन्तस्पथा) भीतर मार्ग जिनके वे और (अनुपथाः) अनुकूल मार्ग जिनका वे (एतेभिः) इन मार्गों में स्थित हुओं और (नामभिः) संज्ञाओं से (मह्यम्) मेरे लिये (यज्ञम्) विद्वानों के सत्कार आदि कर्म को (विष्टारः) विस्तार (ओहते) प्राप्त होता है ॥१०॥
Essence
हे मनुष्यो ! आप लोग सम्पूर्ण विद्याओं और उनसे उत्पन्न क्रिया हुए क्रिया कौशल मार्गों को यथावत् प्रत्यक्ष करके अन्यों को भी उत्तम प्रकार जनाओ सिखलाओ ॥१०॥
Subject
मनुष्यों को समस्त विद्या धर्ममार्ग ढूँढने चाहियें, इस विषय को कहते हैं ॥