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Rigveda Mandal 5 / Sukta 51 / Mantra 9

87 Sukta
15 Mantra
5/51/9
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- स्वस्त्यात्रेयः Chhanda- विराडुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
स॒जूर्मि॒त्रावरु॑णाभ्यां स॒जूः सोमे॑न॒ विष्णु॑ना। आ या॑ह्यग्ने अत्रि॒वत्सु॒ते र॑ण ॥९॥

स॒ऽजूः । मि॒त्रावरु॑णाभ्याम् । स॒ऽजूः । सोमे॑न । विष्णु॑ना । आ । या॒हि॒ । अ॒ग्ने॒ । अ॒त्रि॒ऽवत् । सु॒ते । रण॒ ॥

Mantra without Swara
सजूर्मित्रावरुणाभ्यां सजूः सोमेन विष्णुना। आ याह्यग्ने अत्रिवत्सुते रण ॥

सऽजूः। मित्रावरुणाभ्याम्। सऽजूः। सोमेन। विष्णुना। आ। याहि। अग्ने। अत्रिऽवत्। सुते। रण ॥९॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 6 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वन् ! आप (मित्रावरुणाभ्याम्) प्राण और उदान पवनों से (सजूः) संयुक्त (सोमेन) ऐश्वर्य्य वा चन्द्र से और (विष्णुना) व्यापक आकाश से (सजूः) संयुक्त और (सुते) उत्पन्न हुए जगत् में (अत्रिवत्) व्यापक के सदृश है, उसके जानने के लिये (आ, याहि) प्राप्त हूजिये और हम लोगों के लिये सत्य का (रण) उपदेश कीजिये ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो मनुष्य प्राण और अपान आदि में स्थित बिजुली की विद्या को जानें तो बहुत सुख को प्राप्त होवें ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥