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Rigveda Mandal 5 / Sukta 51 / Mantra 15

87 Sukta
15 Mantra
5/51/15
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- स्वस्त्यात्रेयः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स्व॒स्ति पन्था॒मनु॑ चरेम सूर्याचन्द्र॒मसा॑विव। पुन॒र्दद॒ताघ्न॑ता जान॒ता सं ग॑मेमहि ॥१५॥

स्व॒स्ति । पन्था॑म् । अनु॑ । च॒रे॒म॒ । सू॒र्या॒च॒न्द्र॒मसौ॑ऽइव । पुनः॑ । दद॑ता । अघ्न॑ता । जा॒न॒ता । सम् । ग॒मे॒म॒हि॒ ॥

Mantra without Swara
स्वस्ति पन्थामनु चरेम सूर्याचन्द्रमसाविव। पुनर्ददताघ्नता जानता सं गमेमहि ॥

स्वस्ति। पन्थाम्। अनु। चरेम। सूर्याचन्द्रमसौऽइव। पुनः। ददता। अघ्नता। जानता। सम्। गमेमहि ॥१५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 7 Mantra » 5

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Meaning
हम लोग (सूर्याचन्द्रमसाविव) सूर्य्य और चन्द्रमा के सदृश (स्वस्ति) सुख (पन्थाम्) मार्गों के (अनु, चरेम) अनुगामी हों और (पुनः) फिर (ददता) दान करने (अघ्नता) और नहीं नाश करनेवाले (जानता) विद्वान् के साथ (सम्, गमेमहि) मिलें ॥१५॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य्य और चन्द्रमा नियम से दिनरात्रि चलते हैं, वैसे न्याय के मार्ग को प्राप्त हूजिये और सज्जनों के साथ समागम करिये ॥१५॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह इक्यावनवाँ सूक्त और सप्तम वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
मनुष्यों को विद्वानों के सङ्ग से जो धर्ममार्ग उससे चलना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥