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Rigveda Mandal 5 / Sukta 51 / Mantra 12

87 Sukta
15 Mantra
5/51/12
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- स्वस्त्यात्रेयः Chhanda- निचृदुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
स्व॒स्तये॑ वा॒युमुप॑ ब्रवामहै॒ सोमं॑ स्व॒स्ति भुव॑नस्य॒ यस्पतिः॑। बृह॒स्पतिं॒ सर्व॑गणं स्व॒स्तये॑ स्व॒स्तय॑ आदि॒त्यासो॑ भवन्तु नः ॥१२॥

स्व॒स्तये॑ । व॒युम् । उप॑ । ब्र॒वा॒म॒है॒ । सोम॑म् । स्व॒स्ति । भुव॑नस्य । यः । पतिः॑ । बृह॒स्पति॑म् । सर्व॑ऽगणम् । स्व॒स्तये॑ । स्व॒स्तये॑ । आ॒दि॒त्यासः॑ । भ॒व॒न्तु॒ । नः॒ ॥

Mantra without Swara
स्वस्तये वायुमुप ब्रवामहै सोमं स्वस्ति भुवनस्य यस्पतिः। बृहस्पतिं सर्वगणं स्वस्तये स्वस्तय आदित्यासो भवन्तु नः ॥

स्वस्तये। वायुम्। उप। ब्रवामहै। सोमम्। स्वस्ति। भुवनस्य। यः। पतिः। बृहस्पतिम्। सर्वऽगणम्। स्वस्तये। स्वस्तये। आदित्यासः। भवन्तु। नः ॥१२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 7 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग (स्वस्तये) सुख के लिये (वायुम्) वायुविद्या और (सोमम्) ऐश्वर्य्य का (उप, ब्रवामहै) उपदेश देवें, वैसे सुनकर आप लोग अन्यों के प्रति उपदेश दीजिये और (यः) जो (भुवनस्य) लोक का (पतिः) स्वामी है वह (स्वस्तये) उपद्रव दूर होने के लिये (सर्वगणम्) सम्पूर्ण समूह जिसमें उस (बृहस्पतिम्) बड़ी वेदवाणियों के स्वामी को और (नः) हम लोगों के लिये (स्वस्ति) सुख को धारण करे और जैसे (आदित्यासः) अड़तालीस वर्ष परिमित ब्रह्मचर्य्य से किया विद्याभ्यास जिन्होंने तथा जो मास के सदृश सम्पूर्ण विद्याओं में व्याप्त वे हम लोगों के अर्थ (स्वस्तये) अत्यन्त सुख के लिये (भवन्तु) होवें, वैसे आप लोगों के लिये भी हों ॥१२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । मनुष्य परस्पर पदार्थविद्या को सुन और अभ्यास करके विद्वान् होवें ॥१२॥
Subject
फिर मनुष्य कैसे विद्यावृद्धि करें, इस विषय को कहते हैं ॥