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Rigveda Mandal 5 / Sukta 51 / Mantra 10

87 Sukta
15 Mantra
5/51/10
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- स्वस्त्यात्रेयः Chhanda- निचृदुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
स॒जूरा॑दि॒त्यैर्वसु॑भिः स॒जूरिन्द्रे॑ण वा॒युना॑। आ या॑ह्यग्ने अत्रि॒वत्सु॒ते र॑ण ॥१०॥

स॒ऽजूः । आ॒दि॒त्यैः । वसु॑ऽभिः । स॒ऽजूः । इन्द्रे॑ण । वा॒युना॑ । आ । या॒हि॒ । अ॒ग्ने॒ । अ॒त्रि॒ऽवत् । सु॒ते । रण॒ ॥

Mantra without Swara
सजूरादित्यैर्वसुभिः सजूरिन्द्रेण वायुना। आ याह्यग्ने अत्रिवत्सुते रण ॥

सऽजूः। आदित्यैः। वसुऽभिः। सऽजूः। इन्द्रेण। वायुना। आ। याहि। अग्ने। अत्रिऽवत्। सुते। रण ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 6 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्नि) अग्नि के समान विद्वन् ! जो (आदित्यैः) महीनों और (वसुभिः) पृथिवी आदिकों के साथ (सजूः) संयुक्त और (वायुना) बलवान् (इन्द्रेण) जीव के साथ (सजूः) संयुक्त (सुते) उत्पन्न हुए जगत् में (अत्रिवत्) व्यापक के सदृश वर्त्तमान है, उसके जनाने के लिये (आ, याहि) प्राप्त हूजिये और (रण) उपदेश करिये ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो मन सम्बन्धी बिजुलीरूप अग्नि आकाश में स्थित हुआ वर्त्तमान है, उसको जान कर कार्य्यों में उपयोग करिये ॥१०॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय को कहते हैं ॥