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Rigveda Mandal 5 / Sukta 51 / Mantra 1

87 Sukta
15 Mantra
5/51/1
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- स्वस्त्यात्रेयः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अग्ने॑ सु॒तस्य॑ पी॒तये॒ विश्वै॒रूमे॑भि॒रा ग॑हि। दे॒वेभि॑र्ह॒व्यदा॑तये ॥१॥

अग्ने॑ । सु॒तस्य॑ । पी॒तये॑ । विश्वैः॑ । ऊमे॑भिः । आ । ग॒हि॒ । दे॒वेभिः॑ । ह॒व्यऽदा॑तये ॥

Mantra without Swara
अग्ने सुतस्य पीतये विश्वैरूमेभिरा गहि। देवेभिर्हव्यदातये ॥

अग्ने। सुतस्य। पीतये। विश्वैः। ऊमेभिः। आ। गहि। देवेभिः। हव्यऽदातये ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 5 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वन् ! आप (विश्वैः) सम्पूर्ण (ऊमेभिः) रक्षा आदि करनेवाले (देवेभिः) विद्वानों के साथ (सुतस्य) निकाले हुए ओषधिरस के (पीतये) पान करने के लिये और (हव्यदातये) देने योग्य वस्तु के देने के लिये (आ, गहि) प्राप्त हूजिये ॥१॥
Essence
जो विद्वान् जन अत्यन्त विद्वान् के साथ सम्पूर्ण जनों को उत्तम प्रकार बोध देवें तो सब आनन्दित होवें ॥१॥
Subject
अब पन्द्रह ऋचावाले इक्यावनवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् जन विद्वानों के साथ क्या करे, यह उपदेश किया जाता है ॥