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Rigveda Mandal 5 / Sukta 50 / Mantra 4

87 Sukta
5 Mantra
5/50/4
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- स्वस्त्यात्रेयः Chhanda- निचृदुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
यत्र॒ वह्नि॑र॒भिहि॑तो दु॒द्रव॒द्द्रोण्यः॑ प॒शुः। नृ॒मणा॑ वी॒रप॒स्त्योऽर्णा॒ धीरे॑व॒ सनि॑ता ॥४॥

यत्र॑ । वह्निः॑ । अ॒भिऽहि॑तः । दु॒द्रव॑त् । द्रोण्यः॑ । प॒शुः । नृ॒ऽमनाः॑ । वी॒रऽप॑स्त्यः । अर्णाः॑ । धीरा॑ऽइव । सनि॑ता ॥

Mantra without Swara
यत्र वह्निरभिहितो दुद्रवद्द्रोण्यः पशुः। नृमणा वीरपस्त्योऽर्णा धीरेव सनिता ॥

यत्र। वह्निः। अभिऽहितः। दुद्रवत्। द्रोण्यः। पशुः। नृऽमनाः। वीरऽपस्त्यः। अर्णा। धीराऽइव। सनिता ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 4 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यत्र) जिसमें (द्रोण्यः) शीघ्र चलनेवालों में उत्पन्न (पशुः) जो देखा जाता है, उसके सदृश (अभिहितः) कहा गया वा धारण किया गया (वह्निः) प्राप्त करनेवाला अग्नि (दुद्रवत्) अत्यन्त चलता है, वहाँ (अर्णा) प्राप्त करानेवाली (धीरेव) ध्यानवती के सदृश (नृमणाः) मनुष्यों में जिसका मन (वीरपस्त्यः) जिसके गृह में वीर वह पुत्र (सनिता) विभाग करनेवाला होवे ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो अग्नि के सदृश तेजस्वी और वेग से युक्त होवें, वे सत्य और असत्य के विभाग करनेवाले होवें ॥४॥
Subject
जो अग्नि के सदृश व्यवहार के धारण करनेवाले होवें, वे धीर होते हैं, इस विषय को कहते हैं ॥