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Rigveda Mandal 5 / Sukta 50 / Mantra 3

87 Sukta
5 Mantra
5/50/3
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- स्वस्त्यात्रेयः Chhanda- स्वराडुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अतो॑ न॒ आ नॄनति॑थी॒नतः॒ पत्नी॑र्दशस्यत। आ॒रे विश्वं॑ पथे॒ष्ठां द्वि॒षो यु॑योतु॒ यूयु॑विः ॥३॥

अतः॑ । नः॒ । आ । नॄन् । अति॑थीन् । अतः॑ । पत्नीः॑ । द॒श॒स्य॒त॒ । आ॒रे । विश्व॑म् । प॒थे॒ऽस्थाम् । द्वि॒षः । यु॒यो॒तु॒ यूयु॑विः ॥

Mantra without Swara
अतो न आ नॄनतिथीनतः पत्नीर्दशस्यत। आरे विश्वं पथेष्ठां द्विषो युयोतु यूयुविः ॥

अतः। नः। आ। नॄन्। अतिथीन्। अतः। पत्नीः। दशस्यत। आरे। विश्वम्। पथेऽस्थाम्। द्विषः। युयोतु। यूयुविः ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 4 Mantra » 3

Bhashya

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Meaning
हे मनुष्यो ! (अतः) इस कारण से (नः) हम लोगों और (नॄन्) अधर्म्म से अलग कर धर्म्म के मार्ग को चलानेवाले (अतिथीन्) जिनके आगमन की तिथि नियत नहीं उनको (अतः) इसके अनन्तर (पत्नीः) स्त्रियों को (आ) सब प्रकार से (दशस्यत) प्रबल करिये और (विश्वम्) सम्पूर्ण जन को तथा (पथेष्ठाम्) जो धर्म्मयुक्त पथ में स्थित हो उसको (आरे) समीप में प्रबल करिये और (यूयुविः) विभाग करनेवाला (द्विषः) द्वेष्टा जनों को दूर में (युयोतु) विशेष करके विभक्त करें ॥३॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि धार्मिक अतिथियों की उत्तम प्रकार सेवा कर मिल के विवेक को प्राप्त होकर द्वेष आदि दोषों को दूर करें ॥३॥
Subject
मनुष्यों को किस का सत्कार करना और क्या प्राप्त करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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