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Rigveda Mandal 5 / Sukta 50 / Mantra 1

87 Sukta
5 Mantra
5/50/1
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- प्रतिप्रभ आत्रेयः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
विश्वो॑ दे॒वस्य॑ ने॒तुर्मर्तो॑ वुरीत स॒ख्यम्। विश्वो॑ रा॒य इ॑षुध्यति द्यु॒म्नं वृ॑णीत पु॒ष्यसे॑ ॥१॥

विश्वः॑ । दे॒वस्य॑ । ने॒तुः । मर्तः॑ । वु॒री॒त॒ । स॒ख्यम् । विश्वः॑ । रा॒ये । इ॒षु॒ध्य॒ति॒ । द्यु॒म्नम् । वृ॒णी॒त॒ । पु॒ष्यसे॑ ॥

Mantra without Swara
विश्वो देवस्य नेतुर्मर्तो वुरीत सख्यम्। विश्वो राय इषुध्यति द्युम्नं वृणीत पुष्यसे ॥

विश्वः। देवस्य। नेतुः। मर्तः। वुरीत। सख्यम्। विश्वः। राये। इषुध्यति। द्युम्नम्। वृणीत। पुष्यसे ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 4 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
(विश्वः) सम्पूर्ण (मर्त्तः) मनुष्य (नेतुः) अग्रणी (देवस्य) विद्वान् की (सख्यम्) मित्रता को (वुरीत) स्वीकार करें और (विश्वः) सम्पूर्ण (राये) धन के लिये (इषुध्यति) वाणों को धारण करता है और जिससे आप (पुष्यसे) पुष्ट होते हैं, उस (द्युम्नम्) यश को आप (वृणीत) स्वीकार करिये ॥१॥
Essence
सब मनुष्यों को चाहिये कि विद्या धन और शरीरपुष्टि की प्राप्ति के लिये विद्वानों की शिक्षा, शरीर और आत्मा से परिश्रम निरन्तर करें ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले पचासवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों के साथ मित्रता से विद्या और धन को प्राप्त होकर यज्ञ बढ़ावें, इस विषय को कहते हैं ॥