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Rigveda Mandal 5 / Sukta 49 / Mantra 1

87 Sukta
5 Mantra
5/49/1
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- प्रतिभानुरात्रेयः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
दे॒वं वो॑ अ॒द्य स॑वि॒तार॒मेषे॒ भगं॑ च॒ रत्नं॑ वि॒भज॑न्तमा॒योः। आ वां॑ नरा पुरुभुजा ववृत्यां दि॒वेदि॑वे चिदश्विना सखी॒यन् ॥१॥

दे॒वम् । वः॒ । अ॒द्य । स॒वि॒तार॑म् । आ । ई॒षे॒ । भग॑म् । च॒ । रत्न॑म् । वि॒ऽभज॑न्तम् । आ॒योः । आ । वा॒म् । न॒रा॒ । पु॒रु॒ऽभु॒जा॒ । व॒वृ॒त्या॒म् । दि॒वेऽदि॑वे । चि॒त् । अ॒श्वि॒ना॒ । स॒खि॒ऽयन् ॥

Mantra without Swara
देवं वो अद्य सवितारमेषे भगं च रत्नं विभजन्तमायोः। आ वां नरा पुरुभुजा ववृत्यां दिवेदिवे चिदश्विना सखीयन् ॥

देवम्। वः। अद्य। सवितारम्। आ। ईषे। भगम्। च। रत्नम्। विऽभजन्तम्। आयोः। आ। वाम्। नरा। पुरुऽभुजाः। ववृत्याम्। दिवेऽदिवे। चित्। अश्विना। सखिऽयन् ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 3 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! मैं (अद्य) आज (वः) आप लोगों के लिये (आयोः) जीवन का (विभजन्तम्) विभाग करते हुए (देवम्) विद्वान् (सवितारम्) ऐश्वर्यवान् (रत्नम्) रमणीय धन (भगम्) और ऐश्वर्य्य को (च) भी (आ, ईषे) अच्छे प्रकार चाहता हूँ और हे (पुरुभुजा) बहुतों का पालन करते हुए (नरा) अग्रणी (अश्विना) राजा और प्रजाजनो ! (सखीयन्) मित्र के सदृश आचरण करता हुआ मैं (चित्) निश्चित (दिवेदिवे) प्रतिदिन (वाम्) आप दोनों को (आ, ववृत्याम्) अच्छे प्रकार वर्त्ताऊँ ॥१॥
Essence
जो मनुष्य मित्र होकर दूसरे के लिये सुख की इच्छा करें, वे सदा ही आदर करने योग्य होवें ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले उनचासवें सूक्त का प्रारम्भ किया जाता है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को चाहिये कि परोपकार ही करें, इस विषय को कहते हैं ॥