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Rigveda Mandal 5 / Sukta 48 / Mantra 1

87 Sukta
5 Mantra
5/48/1
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- प्रतिरथ आत्रेयः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
कदु॑ प्रि॒याय॒ धाम्ने॑ मनामहे॒ स्वक्ष॑त्राय॒ स्वय॑शसे म॒हे व॒यम्। आ॒मे॒न्यस्य॒ रज॑सो॒ यद॒भ्र आँ अ॒पो वृ॑णा॒ना वि॑त॒नोति॑ मा॒यिनी॑ ॥१॥

कत् । ऊँ॒ इति॑ । प्रि॒याय॑ । धाम्ने॑ । म॒ना॒म॒हे॒ । स्वऽक्ष॑त्राय । स्वऽय॑शसे । म॒हे । व॒यम् । आ॒ऽमे॒न्यस्य॑ । रज॑सः । यत् । अ॒भ्रे । आ । अ॒पः । वृ॒णा॒ना । वि॒ऽत॒नोति॑ । मा॒यिनी॑ ॥

Mantra without Swara
कदु प्रियाय धाम्ने मनामहे स्वक्षत्राय स्वयशसे महे वयम्। आमेन्यस्य रजसो यदभ्र आँ अपो वृणाना वितनोति मायिनी ॥

कत्। ऊँ इति। प्रियाय। धाम्ने। मनामहे। स्वऽक्षत्राय। स्वऽयशसे। महे। वयम्। आऽमेन्यस्य। रजसः। यत्। अभ्रे। आ। अपः। वृणाना। विऽतनोति। मायिनी ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 2 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
(यत्) जो (आमेन्यस्य) चारों और से ज्ञान के विषय (रजसः) लोक के मध्य में और (अभ्रे) मेघ में (अपः) जलों का (आ, वृणाना) उत्तम प्रकार स्वीकार करती हुई और (मायिनी) बुद्धि जिसमें विद्यमान वह नीति (वितनोति) विस्तारयुक्त करती है उसको (उ) भी (वयम्) हम लोग (महे) बड़े (प्रियाय) सुन्दर (धाम्ने) जन्म, स्थान और नाम स्वरूप के लिये (स्वक्षत्राय) अपने राज्य वा क्षत्रिय कुल के लिये और (स्वयशसे) अपना यश जिससे उसके लिये (कत्) कब (मनामहे) जानें ॥१॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि निरन्तर इस प्रकार से इच्छा करें, जिससे राज्य, यश और धर्म्म बढ़े, वैसे ही स्वीकार करके अनुष्ठान करें ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले अड़तालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में फिर मनुष्यों को किसकी इच्छा करनी चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥