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Rigveda Mandal 5 / Sukta 47 / Mantra 6

87 Sukta
7 Mantra
5/47/6
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- प्रतिरथ आत्रेयः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि त॑न्वते॒ धियो॑ अस्मा॒ अपां॑सि॒ वस्त्रा॑ पु॒त्राय॑ मा॒तरो॑ वयन्ति। उ॒प॒प्र॒क्षे वृष॑णो॒ मोद॑माना दि॒वस्प॒था व॒ध्वो॑ य॒न्त्यच्छ॑ ॥६॥

वि । त॒न्व॒ते॒ । धियः॑ । अ॒स्मै॒ । अपां॑सि । वस्त्रा॑ । पु॒त्राय॑ । मा॒तरः॑ । व॒य॒न्ति॒ । उ॒प॒ऽप्र॒क्षे । वृष॑णः । मोद॑मानाः । दि॒वः । प॒था । व॒ध्वः॑ । य॒न्ति॒ । अच्छ॑ ॥

Mantra without Swara
वि तन्वते धियो अस्मा अपांसि वस्त्रा पुत्राय मातरो वयन्ति। उपप्रक्षे वृषणो मोदमाना दिवस्पथा वध्वो यन्त्यच्छ ॥

वि। तन्वते। धियः। अस्मै। अपांसि। वस्त्रा। पुत्राय। मातरः। वयन्ति। उपऽप्रक्षे। वृषणः। मोदमानाः। दिवः। पथा। वध्वः। यन्ति। अच्छ ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 1 Mantra » 6

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (दिवः) कामना और (मोदमानाः) आनन्द करती हुई (वध्वः) युवावस्थायुक्त स्त्रियाँ (पथा) गृहाश्रम के मार्ग से वर्त्तमान (उपप्रक्षे) सम्बन्ध में (वृषणः) युवा पुरुषों को (अच्छ) उत्तम प्रकार (यन्ति) प्राप्त होती हैं, वे (मातरः) माता (अस्मै) इस व्यवहार से सिद्ध (पुत्राय) पुत्र के लिये (धियः) बुद्धियों और (अपांसि) कर्म्मों को (वि, तन्वते) विस्तार करती हैं और (वस्त्रा) वस्त्रों को (वयन्ति) बनाती हैं ॥६॥
Essence
जो स्त्री और पुरुष ब्रह्मचर्य्य से विद्याओं को पढ़ कर युवावस्था में वर्त्तमान गृहाश्रम की कामना करते हुए परस्पर प्रीति से स्वयंवर विवाह करके धर्म से सन्तानों को उत्पन्न कर और उत्तम प्रकार शिक्षा देकर शरीर और आत्मा के बल का विस्तार करते हैं और जैसे वस्त्रों से शरीर को वैसे गृहाश्रम के व्यवहार का आच्छादन करके आनन्द करते हैं ॥६॥
Subject
मनुष्यों को चाहिये कि युवा अवस्था ही में स्वयंवर विवाह करें, इस विषय को कहते हैं ॥