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Rigveda Mandal 5 / Sukta 47 / Mantra 3

87 Sukta
7 Mantra
5/47/3
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- प्रतिरथ आत्रेयः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒क्षा स॑मु॒द्रो अ॑रु॒षः सु॑प॒र्णः पूर्व॑स्य॒ योनिं॑ पि॒तुरा वि॑वेश। मध्ये॑ दि॒वो निहि॑तः॒ पृश्नि॒रश्मा॒ वि च॑क्रमे॒ रज॑सस्पा॒त्यन्तौ॑ ॥३॥

उ॒क्षा । स॒मु॒द्रः । अ॒रु॒षः । सु॒ऽप॒र्णः । पूर्व॑स्य । योनि॑म् । पि॒तुः । आ । वि॒वे॒श॒ । मध्ये॑ । दि॒वः । निऽहि॑तः । पृश्निः॑ । अश्मा॑ । वि । च॒क्र॒मे॒ । रज॑सः । पा॒ति॒ । अन्तौ॑ ॥

Mantra without Swara
उक्षा समुद्रो अरुषः सुपर्णः पूर्वस्य योनिं पितुरा विवेश। मध्ये दिवो निहितः पृश्निरश्मा वि चक्रमे रजसस्पात्यन्तौ ॥

उक्षा। समुद्रः। अरुषः। सुऽपर्णः। पूर्वस्य। योनिम्। पितुः। आ। विवेश। मध्ये। दिवः। निऽहितः। पृश्निः। अश्मा। वि। चक्रमे। रजसः। पाति। अन्तौ ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 1 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (समुद्रः) सागर (अरुषः) सुख को प्राप्त करानेवाला (सुपर्णः) सुन्दर पालन जिसके ऐसा और (दिवः) प्रकाश के (मध्ये) मध्य में (निहितः) स्थापित किया गया (पृश्निः) अन्तरिक्ष और (अश्मा) मेघ (उक्षा) सींचनेवाला (पूर्वस्य) पूर्ण आकाश आदि और (पितुः) पालन करनेवाले के (योनिम्) कारण को (आ, विवेश) सब प्रकार प्रविष्ट होता है और (रजसः) लोक में उत्पन्न हुए का (वि, चक्रमे) विशेष करके क्रमण करता और (अन्तौ) समीप में (पाति) रक्षा करता है, वह सब को जानने योग्य है ॥३॥
Essence
हे मनुष्यो ! आप लोग कार्य्य और कारण को जानकर उनके संयोग से उत्पन्न हुए वस्तुओं को कार्य्यों में उपयुक्त करके अपने अभीष्ट की सिद्धि करें ॥३॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या जानना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥