Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 5 / Sukta 47 / Mantra 2

87 Sukta
7 Mantra
5/47/2
Devata- देवपत्न्यः Rishi- प्रतिक्षत्र आत्रेयः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒जि॒रास॒स्तद॑प॒ ईय॑माना आतस्थि॒वांसो॑ अ॒मृत॑स्य॒ नाभि॑म्। अ॒न॒न्तास॑ उ॒रवो॑ वि॒श्वतः॑ सीं॒ परि॒ द्यावा॑पृथि॒वी य॑न्ति॒ पन्थाः॑ ॥२॥

अ॒जि॒रासः॑ । तत्ऽअ॑पः । ईय॑मानाः । आ॒त॒स्थि॒ऽवांसः॑ । अ॒मृत॑स्य । नाभि॑म् । अ॒न॒न्तासः॑ । उ॒रवः॑ । वि॒श्वतः॑ । सी॒म् । परि॑ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । य॒न्ति॒ । पन्थाः॑ ॥

Mantra without Swara
अजिरासस्तदप ईयमाना आतस्थिवांसो अमृतस्य नाभिम्। अनन्तास उरवो विश्वतः सीं परि द्यावापृथिवी यन्ति पन्थाः ॥

अजिरासः। तत्ऽअपः। ईयमानाः आतस्थिऽवांसः। अमृतस्य। नाभिम्। अनन्तासः। उरवः। विश्वतः। सीम्। परि। द्यावापृथिवी इति। यन्ति। पन्थाः ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 1 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (अजिरासः) वेग से युक्त (ईयमानाः) प्राप्त होते हुए (तदपः) उनके प्राणों को (अमृतस्य) नाश से रहित कारण के (नाभिम्) मध्य में (आतस्थिवांसः) सब ओर से स्थित (अनन्तासः) नहीं विद्यमान अन्त जिनका वे (उरवः) बहुत (विश्वतः) सब ओर (द्यावापृथिवी) प्रकाश और भूमि (सीम्) सूर्य्य के प्रकाश के सदृश (परि) चारों और (यन्ति) प्राप्त होते हैं उनका (पन्थाः) मार्ग जानना चाहिये ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जो आकाश आदि अनन्त पदार्थ हैं, उनमें वर्त्तमान असंख्य परमाणु और वे कारण के मध्य में कारण से उत्पन्न हुए सूर्य्य और प्रकाश के सदृश विस्तीर्ण हैं ॥२॥
Subject
अब मनुष्यों का कार्य कारण से विस्तृत अनन्त पदार्थों को जान कर कार्यसिद्धि करनी चाहिये ॥