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Rigveda Mandal 5 / Sukta 47 / Mantra 1

87 Sukta
7 Mantra
5/47/1
Devata- देवपत्न्यः Rishi- प्रतिक्षत्र आत्रेयः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
प्र॒यु॒ञ्ज॒ती दि॒व ए॑ति ब्रुवा॒णा म॒ही मा॒ता दु॑हि॒तुर्बो॒धय॑न्ती। आ॒विवा॑सन्ती युव॒तिर्म॑नी॒षा पि॒तृभ्य॒ आ सद॑ने॒ जोहु॑वाना ॥१॥

प्र॒यु॒ञ्ज॒ती । दि॒वः । ए॒ति॒ । ब्रु॒वा॒णा । म॒ही । मा॒ता । दु॒हि॒तुः । बो॒धय॑न्ती । आ॒ऽविवा॑सन्ती । यु॒व॒तिः । म॒नी॒षा । पि॒तृऽभ्यः । आ । सद॑ने । जोहु॑वाना ॥

Mantra without Swara
प्रयुञ्जती दिव एति ब्रुवाणा मही माता दुहितुर्बोधयन्ती। आविवासन्ती युवतिर्मनीषा पितृभ्य आ सदने जोहुवाना ॥

प्रऽयुञ्जती। दिवः। एति। ब्रुवाणा। मही। माता। दुहितुः। बोधयन्ती। आऽविवासन्ती। युवतिः। मनीषा। पितृऽभ्यः। आ। सदने। जोहुवाना ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 1 Mantra » 1

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Meaning
जो (दिवः) प्रकाश से प्रातःकाल के सदृश (ब्रुवाणा) उपदेश देती (प्रयुञ्जती) उत्तम कर्म्म में अच्छे प्रकार योग करती (दुहितुः) कन्या का (बोधयन्ती) बोध देती और (मही) आदर करने योग्य (आविवासन्ती) सब प्रकार से सेवती हुई (सदने) गृह में (जोहुवाना) अत्यन्त प्रशंसा को प्राप्त (युवतिः) युवा अवस्था में विद्याओं को पढ़कर विवाह जिसने किया वह (माता) आदर करनेवाली माता (मनीषा) बुद्धि से (पितृभ्यः) पालन करनेवालों से शिक्षा को प्राप्त गृहाश्रम को (आ) सब प्रकार से (एति) जाती वा प्राप्त होती है, वह मङ्गलकारिणी होती है ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो माता पाँचवें वर्ष के प्रारम्भ होने तक सन्तानों को बोध देकर पाँचवें वर्ष में पिता को सौंपती है और पिता भी तीन वर्ष पर्य्यन्त शिक्षा देकर आचार्य्य को पुत्रों को और आचार्य्य की स्त्री को कन्याओं को ब्रह्मचर्य से विद्याग्रहण के लिये सौंपता है और वे आचार्यादि भी नियत समयपर्य्यन्त ब्रह्मचर्य्य को समाप्त करा के और विद्याओं को प्राप्त करा के तथा व्यवहार की शिक्षा देकर गृहाश्रम में प्रविष्ट कराते हैं, वे आचार्य और आचार्य्या कुल के भूषक और शोभाकारक होते हैं ॥१॥
Subject
अब सात ऋचावाले सैंतालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में स्त्री पुरुषों के गुणों को कहते हैं ॥

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