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Rigveda Mandal 5 / Sukta 46 / Mantra 8

87 Sukta
8 Mantra
5/46/8
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- प्रतिक्षत्र आत्रेयः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
उ॒त ग्ना व्य॑न्तु दे॒वप॑त्नीरिन्द्रा॒ण्य१॒॑ग्नाय्य॒श्विनी॒ राट्। आ रोद॑सी वरुणा॒नी शृ॑णोतु॒ व्यन्तु॑ दे॒वीर्य ऋ॒तुर्जनी॑नाम् ॥८॥

उ॒त । ग्नाः । व्य॒न्तु॒ । दे॒वऽप॑त्नीः । इ॒न्द्रा॒णी । अ॒ग्नायी॑ । अ॒श्विनी॑ । राट् । आ । रोद॑सी॒ इति॑ । व॒रु॒णा॒नी । शृ॒णो॒तु॒ । व्यन्तु॑ । दे॒वीः । यः । ऋ॒तुः । जनी॑नाम् ॥

Mantra without Swara
उत ग्ना व्यन्तु देवपत्नीरिन्द्राण्य१ग्नाय्यश्विनी राट्। आ रोदसी वरुणानी शृणोतु व्यन्तु देवीर्य ऋतुर्जनीनाम् ॥

उत। ग्नाः। व्यन्तु। देवऽपत्नीः। इन्द्राणी। अग्नायी। अश्विनी। राट्। आ। रोदसी। इति। वरुणानी। शृणोतु। व्यन्तु। देवीः। यः। ऋतुः। जनीनाम् ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 28 Mantra » 8

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1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो (राट्) प्रकाशमान (इन्द्राणी) अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त पुरुष की स्त्री और (अग्नायी) अग्नि के सदृश तेजस्वी पुरुष की स्त्री (अश्विनी) शीघ्र चलनेवाले की स्त्री और (देवपत्नीः) विद्वानों की स्त्रियाँ न्याय करने के लिये स्त्रियों की (ग्नाः) वाणियों को (व्यन्तु) व्याप्त हों और (रोदसी) अन्तरिक्ष तथा पृथिवी के सदृश (वरुणानी) श्रेष्ठ जन की स्त्री (जनीनाम्) उत्पन्न करनेवाली स्त्रियों की वाणियों को (आ, शृणोतु) सब प्रकार से सुने और (उत) भी (देवीः) विद्यायुक्त स्त्रियाँ (ऋतुः) ऋतु के सदृश क्रम से उत्पन्न करनेवाली स्त्रियों का जो न्याय उसकी (व्यन्तु) कामना करें ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपालङ्कार है । जैसे राजाओं के समीप पुरुष मन्त्री होते हैं, वैसे रानियों के समीप स्त्रियाँ मन्त्री होवें ॥८॥ यह श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य महाविद्वान् विरजानन्द सरस्वती स्वामीजी के शिष्य श्रीमद्दयानद सरस्वती स्वामीजी से रचे हुए, उत्तम प्रमाणयुक्त ऋग्वेदभाष्य के पाँचवें मण्डल में छयालीसवाँ सूक्त और चतुर्थ अष्टक में द्वितीय अध्याय और अट्ठाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
राजा के समान रानी स्त्रियों का न्याय करें, इस विषय को कहते हैं ॥