Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 5 / Sukta 45 / Mantra 6

87 Sukta
11 Mantra
5/45/6
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- सदापृण आत्रेयः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
एता॒ धियं॑ कृ॒णवा॑मा सखा॒योऽप॒ या मा॒ताँ ऋ॑णु॒त व्र॒जं गोः। यया॒ मनु॑र्विशिशि॒प्रं जि॒गाय॒ यया॑ व॒णिग्व॒ङ्कुरापा॒ पुरी॑षम् ॥६॥

आ । इ॒त॒ । धिय॑म् । कृ॒णवा॑म । स॒खा॒यः॒ । अप॑ । या । मा॒ता । ऋ॒णु॒त । व्र॒जम् । गोः । यया॑ । मनुः॑ । वि॒शि॒ऽशि॒प्रम् । जि॒गाय॑ । यया॑ । व॒णिक् । व॒ङ्कुः । आप॑ । पुरी॑षम् ॥

Mantra without Swara
एता धियं कृणवामा सखायोऽप या माताँ ऋणुत व्रजं गोः। यया मनुर्विशिशिप्रं जिगाय यया वणिग्वङ्कुरापा पुरीषम् ॥

आ। इत। धियम्। कृणवाम। सखायः। अप। या। माता। ऋणुत। व्रजम्। गोः। यया। मनुः। विशिऽशिप्रम्। जिगाय। यया। वणिक्। वङ्कुः। आप। पुरीषम् ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 27 Mantra » 1

Bhashya

More bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यया) जिससे (मनुः) मनुष्य (विशिशिप्रम्) सुन्दर ठुढ्ढी और नासिका जिसकी उसको (जिगाय) जीतता है (यया) जिससे (वङ्कुः) धन की इच्छा करनेवाला (वणिक्) व्यापारी वैश्य (पुरीषम्) पूर्ण करनेवाले जल को (आपा) प्राप्त होता है उस (धियम्) बुद्धि को (सखायः) मित्र होते हुए हम लोग (कृणवामा) करें और जैसे (या) जो (माता) माता के सदृश (गोः) किरण से (व्रजम्) मेघ को करता है और दुःख को (अप) दूर करता है, वैसे इसको आप लोग (ऋणुत) सिद्ध करिये और बुद्धि को (आ) सब प्रकार (इता) प्राप्त हूजिये ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । मनुष्यों को योग्य है कि परस्पर में मित्र होकर बुद्धि को बढ़ाय औरों के लिये विशेष ज्ञान अच्छे प्रकार देवें, जैसे वैश्य धन को प्राप्त होकर बढ़ता है, वैसे उत्तम बुद्धि को पाकर बढ़े ॥६॥
Subject
फिर मनुष्यों को उत्तम बुद्धि कैसे प्राप्त होनी चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.