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Rigveda Mandal 5 / Sukta 45 / Mantra 3

87 Sukta
11 Mantra
5/45/3
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- सदापृण आत्रेयः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒स्मा उ॒क्थाय॒ पर्व॑तस्य॒ गर्भो॑ म॒हीनां॑ ज॒नुषे॑ पू॒र्व्याय॑। वि पर्व॑तो॒ जिही॑त॒ साध॑त॒ द्यौरा॒विवा॑सन्तो दसयन्त॒ भूम॑ ॥३॥

अ॒स्मै । उ॒क्थाय॑ । पर्व॑तस्य । गर्भः॑ । म॒हीना॑म् । ज॒नुषे॑ । पू॒र्व्याय॑ । वि । पर्व॑तः । जिही॑त । साध॑त । द्यौः । आ॒ऽविवा॑सन्तः । द॒स॒य॒न्त॒ । भूम॑ ॥

Mantra without Swara
अस्मा उक्थाय पर्वतस्य गर्भो महीनां जनुषे पूर्व्याय। वि पर्वतो जिहीत साधत द्यौराविवासन्तो दसयन्त भूम ॥

अस्मै। उक्थाय। पर्वतस्य। गर्भः। महीनाम्। जनुषे। पूर्व्याय। वि। पर्वतः। जिहीत। साधत। द्यौः। आऽविवासन्तः। दसयन्त। भूम ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 26 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (महीनाम्) भूमियों और (पर्वतस्य) मेघ के (पूर्व्याय) पूर्वों में उत्पन्न (जनुषे) जन्म के लिये तथा (अस्मै) इस (उक्थाय) प्रशंसित के लिये (गर्भः) कारणभूत (पर्वतः) पक्षी के समान पर्ववान् मेघ वा (द्यौः) कामना करते हुए के सदृश (वि, जिहीत) विशेष चलता है और जिसको (आविवासन्तः) सब ओर घूमते हुए (साधत) सिद्ध करें, जिससे दुःख का और (दसयन्त) दोषों का नाश करें, उसके तुल्य हम लोग (भूम) होवें ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जो विद्यार्थियों में विद्या के गर्भ की धारण करते हैं, वे मेघ के सदृश सब के सुखकारक होते हैं ॥३॥
Subject
अब विद्वद्विषय को कहते हैं ॥