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Rigveda Mandal 5 / Sukta 45 / Mantra 2

87 Sukta
11 Mantra
5/45/2
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अवत्सारः काश्यप अन्ये च दृष्टलिङ्गाः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि सूर्यो॑ अ॒मतिं॒ न श्रियं॑ सा॒दोर्वाद्गवां॑ मा॒ता जा॑न॒ती गा॑त्। धन्व॑र्णसो न॒द्यः१॒॑ खादो॑अर्णाः॒ स्थूणे॑व॒ सुमि॑ता दृंहत॒ द्यौः ॥२॥

वि । सूर्यः॑ । अ॒मति॑म् । न । श्रिय॑म् । सा॒त् । आ । ऊ॒र्वात् । गवा॑म् । मा॒ता । जा॒न॒ती । गा॒त् । धन्व॑ऽअर्णसः । न॒द्यः॑ । खादः॑ऽअर्णाः । स्थूणा॑ऽइव । सुऽमि॑ता । दृं॒ह॒त॒ । द्यौः ॥

Mantra without Swara
वि सूर्यो अमतिं न श्रियं सादोर्वाद्गवां माता जानती गात्। धन्वर्णसो नद्यः१ खादोअर्णाः स्थूणेव सुमिता दृंहत द्यौः ॥

वि। सूर्यः। अमतिम्। न। श्रियम्। सात्। आ। ऊर्वात्। गवाम्। माता। जानती। गात्। धन्वऽअर्णसः। नद्यः। खादःऽअर्णाः। स्थूणाऽइव। सुऽमिता। दृंहत। द्यौः ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 26 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जो (द्यौः) कामना करता हुआ (सुमिता) उत्तम प्रकार किया प्रमाण जिनका (स्थूणेव) स्तम्भ के समान विद्या आदि सद्गुणों को (दृंहत) बढ़ाता या धारण करता तथा (खादोअर्णाः) भक्षण करने योग्य अन्न और जल जिनमें और (धन्वर्णसः) स्थल में जल जिनका ऐसी (नद्यः) शब्द करनेवाली नदियों के सदृश वा (जानती) जानती हुई (माता) माता के सदृश शिष्यों और उपदेश करने योग्यों को (गात्) प्राप्त होता है और (सूर्यः) सूर्य्य (अमतिम्) रूप के (न) सदृश (श्रियम्) लक्ष्मी का (वि, सात्) विशेष करके विभाग करता है (गवाम्) किरणों के (ऊर्वात्) बहुत रूप से ऐश्वर्य्य को (आ) अच्छे प्रकार प्राप्त होता है, वही सब को सुखी करने को योग्य होवे ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो सूर्य्य के सदृश विद्या माता के सदृश कृपा, नदी के सदृश उपकार और खम्भ के सदृश धारणा करते हैं, वे ही श्रीमान् और सदा सुखी होते हैं ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥