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Rigveda Mandal 5 / Sukta 45 / Mantra 10

87 Sukta
11 Mantra
5/45/10
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- सदापृण आत्रेयः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आ सूर्यो॑ अरुहच्छु॒क्रमर्णोऽयु॑क्त॒ यद्ध॒रितो॑ वी॒तपृ॑ष्ठाः। उ॒द्ना न नाव॑मनयन्त॒ धीरा॑ आशृण्व॒तीरापो॑ अ॒र्वाग॑तिष्ठन् ॥१०॥

आ । सूर्यः॑ । अ॒रु॒ह॒त् । शु॒क्रम् । अर्णः॑ । अयु॑क्त । यत् । ह॒रितः॑ । वी॒तऽपृ॑ष्ठाः । उ॒द्ना । न । नाव॑म् । अ॒न॒य॒न्त॒ । धीराः॑ । आ॒ऽशृ॒ण्व॒तीः । आपः॑ । अ॒र्वाक् । अ॒ति॒ष्ठ॒न् ॥

Mantra without Swara
आ सूर्यो अरुहच्छुक्रमर्णोऽयुक्त यद्धरितो वीतपृष्ठाः। उद्ना न नावमनयन्त धीरा आशृण्वतीरापो अर्वागतिष्ठन् ॥

आ। सूर्यः। अरुहत्। शुक्रम्। अर्णः। अयुक्त। यत्। हरितः। वीतऽपृष्ठाः। उद्ना। न। नावम्। अनयन्त। धीराः। आऽशृण्वतीः। आपः। अर्वाक्। अतिष्ठन् ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 27 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यत्) जो (सूर्य्यः) सूर्य्य (शुक्रम्) वीर्य का (आ, अरुहत्) आरोहण करता और (अर्णः) उदक का (अयुक्त) योग करता है और (वीतपृष्ठाः) व्याप्त हैं लोकान्तरों के पृष्ठ जिनसे वे (हरितः) जल आदि को हरनेवाले (धीराः) ध्यानवान् बुद्धिमान् जन (उद्ना) जल से (नावम्) नौका को (न) जैसे वैसे (अनयन्त) प्राप्त होते अर्थात् व्यवहार को पहुँचते हैं (अर्वाक्) पीछे (आशृण्वतीः) जो चारों ओर से सुन पड़ते हैं वह (आपः) प्राण (अतिष्ठन्) स्थित होते हैं, उस सब को आप लोग जानें ॥१०॥
Essence
जो मनुष्य सूर्य्य और जल आदि की विद्याओं को जान के नौका आदि को चलावें, वे लक्ष्मीवान् होते हैं ॥१०॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥