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Rigveda Mandal 5 / Sukta 44 / Mantra 7

87 Sukta
15 Mantra
5/44/7
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अवत्सारः काश्यप अन्ये च दृष्टलिङ्गाः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
वेत्यग्रु॒र्जनि॑वा॒न्वा अति॒ स्पृधः॑ समर्य॒ता मन॑सा॒ सूर्यः॑ क॒विः। घ्रं॒सं रक्ष॑न्तं॒ परि॑ वि॒श्वतो॒ गय॑म॒स्माकं॒ शर्म॑ वनव॒त्स्वाव॑सुः ॥७॥

वेति॑ । अग्रुः॑ । जनि॑ऽवान् । वै । अति॑ । स्पृधः॑ । स॒ऽम॒र्य॒ता । मन॑सा । सूर्यः॑ । क॒विः । घ्रं॒सम् । रक्ष॑न्तम् । परि॑ । वि॒श्वतः॑ । गय॑म् । अ॒स्माक॑म् । शर्म॑ । व॒न॒व॒त् । स्वऽव॑सुः ॥

Mantra without Swara
वेत्यग्रुर्जनिवान्वा अति स्पृधः समर्यता मनसा सूर्यः कविः। घ्रंसं रक्षन्तं परि विश्वतो गयमस्माकं शर्म वनवत्स्वावसुः ॥

वेति। अग्रुः। जनिऽवान्। वै। अति। स्पृधः। सऽमर्यता। मनसा। सूर्यः। कविः। घ्रंसम्। रक्षन्तम्। परि। विश्वतः। गयम्। अस्माकम्। शर्म। वनवत्। स्वऽवसुः ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 24 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जो (स्वावसुः) अपनों में बसता वा अपनों को जो बसाता है वह (सूर्य्यः) सूर्य्य के सदृश (कविः) उत्तम बुद्धिमान् (अग्रुः) अग्रगन्ता (जनिवान्) विद्या में जन्मवान् विद्यायुक्त पुरुष (समर्य्यता) संग्राम की इच्छा करते हुए (मनसा) चित्त से (स्पृधः) स्पर्द्धा करते हैं जिनमें उन संग्रामों की इच्छा करते हुए (अति, वेति) अत्यन्त व्याप्त होता है, वह (वै) निश्चय से जैसे सूर्य्य (घ्रंसम्) दिन को वैसे (अस्माकम्) हम लोगों को (विश्वतः) सब से (रक्षन्तम्) रक्षा करते हुए (गयम्) श्रेष्ठ अपत्य वा धन और (शर्म्म) गृह का (परि) सब प्रकार से (वनवत्) संविभाग करे, वह हम लोगों से सत्कार करने योग्य है ॥७॥
Essence
जो मनुष्य विद्या और विनय को प्राप्त, दुष्टों में उग्र और धार्मिको में शान्त और सदा ही दुष्टों के साथ युद्ध करने से प्रजाओं की रक्षा करता हुआ सुख में वास करावे, वह सूर्य्य के सदृश प्रकाशित यशवाला हो ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥